विश्व फुटबॉल : यूरोपीय देशों की ठोकर पर !

विश्व फुटबॉल : यूरोपीय देशों की ठोकर पर !

नई दिल्ली / राजेंद्र सजवान ,
विश्व कप फुटबॉल के पिछले बीस विजेताओं पर सरसरी नज़र डालें तो यूरोप और लेटिन अमेरिका ने लगभग आधा आधा सम्मान बाँटा है | ब्राज़ील ने पाँच बार खिताब पर कब्जा जमा कर लेटिन अमेरिकन फुटबॉल का गौरव बढ़ाया तो उरुग्वे और अर्जेंटीना दो दो बार विजेता बने | शेष ग्यारह खिताब यूरोपीय देशों ने आपस मे बाँटे |लेकिन फ़ीफ़ा कप 2018 के अंतिम चार मे पहुँचने वाले फ्रांस,इंग्लैंड,क्रोएशियाऔर बेल्जियम यूरोपीय देश हैं ||अर्थात चैम्पियन कोई भी बने गौरव यूरोपीय महाद्वीप के साथ जुड़ना तय है | ऐसा पाँचवी बार हुआ है जब यूरोप ने शेष विश्व को सेमिफाइनाल से पहले ही बाहर का रास्ता दिखाया है |

बेशक, सभी यूरोपीय देशों का अंतिम चार मे प्रवेश लेटिन अमेरिकी फुटबाल पर ज़बर्दस्त प्रहार है| ब्राज़ील,उरुग्वे,अर्जेंटीना जैसे पूर्व चैम्पियन देशों का दौड़ से बाहर होना यूरोपीय फुटबाल के एकाधिकार को दर्शाता है| फुटबॉल जानकार पाँच बार के विश्व विजेता ब्राज़ील को खिताब का प्रबल दावेदार मान रहे थे | कुछ लोग अर्जेंटीन की सफलता का दम भर रहे थे लेकिन बाकी देश यूरोपियन दबदबे के आगे हल्के पड़ गये | हालाँकि इटली और नीदरलैंड जैसे देश क्वालीफ़ाई नहीं कर पाए और स्पेन,पुर्तगाल और जर्मनी जैसे दावेदारों का सफ़र जल्दी ख़त्म हो गया फिरभी पहले चार स्थान यूरोप के नाम रहना तय हो गया है| चैम्पियन कोई भी बने किंतु 2006 के बाद सभी चार यूरोपीय देशों का सेमीफाइनल मे पहुँचना अन्य देशों के लिए ख़तरे की घंटी मानी जा रही है | ख़ासकर, लेटिन अमेरिका,अफ्रीका और एशिया के देशों को गिरेबान मे झाँकने की ज़रूरत है |

कुल मिला कर यूरोपीय फुटबाल ने अन्य को बहुत पीछे छोड़ दिया है | यदि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो फुटबाल जैसे लोकप्रिय खेल के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता | ख़ासकर ब्राज़ील,अर्जेंटीना, उरुग्वे ,पेरू,पराग्वे जैसे देशों को अपने खेल और विश्व कप की ग़लतियों के बारे मे नये सिरे से सोचने की ज़रूरत है | कोरिया और जापान जैसे एशियाई देश भी लगातार मिल रही नाकामी से सबक सीख सकते हैं |

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