मीडिया की करतूत : अर्जुन पर तेंदुलकर होने का दबाव

मीडिया की करतूत : अर्जुन पर तेंदुलकर होने का दबाव

नई दिल्ली / राजेंद्र सजवान,
यह ज़रूरी नहीं कि बड़े और चैम्पियन खिलाड़ी का बेटा भी बड़ा खिलाड़ी बने |ऐसे बहुत से खिलाड़ी हुए हैं जिन्होने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने का फ़ैसला किया और नाकाम रहे| महान बल्लेबाज और भारतीय क्रिकेट को बुलंदियों तक पहुँचाने वाले सुनील गावस्कर और उनके बेटे रोहन गावस्करका उदाहरण लें | रोह्न को लगातार मौके मिले | कुछ एक अवसरों पर अच्छा प्रदर्शन किया पर अपने पिता के आस पास भी नहीं पहुँच पाए | तब बहुत से क्रिकेट जानकारों और समीक्षकों ने कहा कि रोहन पिता की महानता के बोझ तले दब कर रह गये|

कुछ ऐसी ही स्थिति का सामना भारत रत्न सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन को भी करना पड़ सकता है| क्रिकेट पंडितों का मानना है कि अर्जुन मे एक अच्छे खिलाड़ी के तमाम गुण हैं लेकिन पिता की महानता का दबाव झेलने मे वह कहाँ तक सफल रहता है,यह देखने वाली बात होगी | जानकारों का तो यह भी कहना है कि मीडिया का एक खास वर्ग अर्जुन को उसके लक्ष्य से भटका सकता है या उसे मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही डिगा सकता है |

यदि अर्जुन यशस्वी पिता की संतान ना होते तो श्रीलंका अंडर 19 के विरुद्ध खेलते हुए उनके द्वारा लिए गये एक विकेट की शायद ही कोई चर्चा होती और शून्य पर आउट होने पर भी मोटे अक्षरों मे खबर ना छापी जाती | बेशक, मीडिया की यह करतूत एक उभरते खिलाड़ी पर भारी पड़ सकती है | सचिन के बेटे होने पर हर अच्छे बुरे प्रदर्शन को अपने पैमाने से तोलने वाला आख़िर मीडिया होता कौन है ? सचिन नेतो कभी मीडिया से उसकी सिफारिश नहीं की और शायद वह करेंगे भी नहीं | उन्हें अपने कद का आभास है |लेकिन प्रचार माध्यमों को कब समझ आएगी ? ज़रूरत अर्जुन को उसके हाल पर छोड़ने की है | वह पिता के कंधे या मीडिया के भद्देपन के दम पर आगे कदापि नहीं बढ़ना चाहेगा | अतः बेहतर यह होगा कि उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए | वरना एक और बचपन पिता की महानता के बोझतले सिसक कर रह जाएगा !

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3 comments

  1. Your assessment is absolutely correct in the instant case of Chota Tendulkar and Rohan Gavaskar. Another one is Hirwani’s son, who is also representing India in under -19. But, Hockey wizard Dhyan Chand’s son Ashok Kumar is an except ion, who without any pull and push established himself in field hockey during 70s.

    Jiwa Nand Upadhyay
    London

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