बेचारी महिला कबड्डी !

बेचारी महिला कबड्डी !

राजेंद्र सजवान,
प्रो. कबड्डी लीग ने भारतीय पुरुष कबड्डी का भाग्य चमका दिया है | कभी सुविधाओं का रोना रोने वाले खिलाड़ी अब लाखों से करोड़ों तक खेलने लगे हैं | लेकिन महिलाओं का दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा | दो बार एशियाई खेलों की विजेता बनने के बाद भी उन्हें पुरुष खिलाड़ियों जैसा मान -सम्मान और पैसा नहीं मिल पा रहा | कुछ एक को छोड़ ज़्यादातर महिला खिलाड़ियों को ग्रास रुट सुविधाएँ भी नहीं मिल पा रहीं | सही मायने मे प्रमोशन और आधारभूत संरचना के मामले में देश में महिला कबड्डी का विकास हुआही नहीं है।

राजधानी के पालम स्पोर्ट्स क्लब ने देश और दिल्ली को दर्जनों महिला खिलाड़ी दी हैं | क्लब की 50 वर्षीय कोच और शारीरिक शिक्षा शिक्षक नीलम साहू, अजय साहू के साथ मिलकर पिछले 25 साल से लड़कियों को कबड्डी का प्रशिक्षण दे रही हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्‍होंने लगभग 300 से अधिक खिलाड़ियों को खेल के गुर सिखाए| इनमें से नौ खिलाडि़यों ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आयोजनों मे देश का प्रतिनिधित्व किया | लेकिन नीलम मानती हैं कि महिला खिलाड़ियों को आज भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है क्योंकि उनकी हालत मे कोई सुधार नहीं हुआ है

नीलम और उनकी जैसी कई कोच और पूर्व खिलाड़ी चाहती हैं कि पुरुषों की तरह महिला खिलाड़ियों को भी बेहतर सुविधाएँ डी जाएँ | उन्हें ग्रास रुट स्तर पर मैट उपलब्ध कराए जाएँ तो महिला खिलाड़ी भी आगे निकल सकती हैं | फिलहाल उन्होने बेहतर सुविधा के साथ प्रशिक्षण देने के लक्ष्‍य के साथ क्राउड फंडिंग प्लेटफार्म ‘मिलाप’ के साथ हाथ मिलाया है | यह फंड महिला खिलाडियों को अपने खेल में उत्कृष्टता प्राप्त करने में मदद करेगा। कोई भी व्‍यक्ति इस प्‍लेटफॉर्म पर आकर महिलाओं की मदद कर सकता है। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि महिला कोच और खिलाड़ी अपने हक केलिए कब तक आवाज़ बुलंद करते रहेंगे ? महिला टीम ने 2010 और 2014 के एशियाड मे देश के लिए स्वर्ण पदक जीते हैं और ख़िताबी तिकड़ी बनाने के लिए भारतीय महिला टीम जकार्ता रवाना हो चुकी है | फेडरेशन कहती है कि शीघ्र ही महिला लीग का भी आयोजन किया जाएगा | लेकिन सबसे पहले महिला कबड्डी की मजबूरी को समझने की ज़रूरत है|

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