गली गली मे ‘मिस्टर इंडिया’और ‘मिस्टर वर्ल्ड’!

गली गली मे ‘मिस्टर इंडिया’और ‘मिस्टर वर्ल्ड’!

राजेंद्र सजवान,
पिछले दो दशकों मे देश के शहरों,गाँवों,गलीकूचों मे जिम और हेल्थ क्लबों की बाढ़ सी आ गई है जिनके देखा देखी एशियन,यूरोपियन और वर्ल्ड चैम्पियन घर घर पैदा होने लगे हैं| लेकिन सच्चाई यह है किभारतीय बॉडी बिल्डिंग का असली और सर्वमान्य चैम्पियन ‘मिस्टर यूनिवर्स’ पंजाब के प्रेमचन्द डेगरा थे,जोकि 1988 मे भारत के लिए विश्व खिताब जीत कर लाए थे | उनसे पहले मोंतोष राय ने 1951में और मनोहर आइच ने 1952 मे यह सम्मान अर्जित कर भारतीय बॉडी बिल्डिंग की चमक दुनिया भर मे फैलाई थी|तब तक इस खेल को बेहद आदर सम्मान से देखा जाता था और मिस्टर यूनिवर्स होने के मायने थे |

दुर्भाग्यवश, बीसवीं सदी जाते जाते भारतीय युवाओं को ऐसी जिम संस्कृति दे गई जिसने बॉडी बिल्डिंग को बर्बाद किया ,गुंडे बदमाश पैदा किए और फूड सप्लिमेंट के नाम पर युवाओं को जहर पिलाने की लत लगाई| ऐसे कुछ जिम के ठेकेदारों ने बॉडी बिल्डिंग और पावर लिफ्टिंग के नाम परदेश की भावी पीढ़ी को गर्त मे धकेला और अपना धंधा चमकाया|

पिछले कुछ सालों मे भारतीय बॉडी बिल्डिंग मे बड़ा बदलाव यह आया कि राष्ट्रीय स्तर पर इस खूबसूरत कला और खेल को हथियाने वाले कई धड़े बन गये | पूर्व अध्यक्ष माधव पुजारी और उनके बाद अमरजीत मलिक के पद पर रहते इस खेल मे भारतीय पहचान बनी रही | तत्पश्चात हर प्रदेश और जिले मे यह खेल धंधा बन गया | जैसे जैसे जिम खुले ,युवाओं को रोज़गार मिला पर साथ ही गली गली मे मिस्टर इंडिया और मिस्टर वर्ल्ड पैदा होने लगे| डेगरा के बाद भारत पचास से भी ज़्यादा मिस्टर वर्ल्ड देख चुका है,जोकि विदेशों मे जाकर तमगे लूट लाते हैं | उनसे पूछने वाला और सच्चाई की जाँच करने वाला कोई भी नहीं है |

कुछ साल पहले जब दिल्ली की बॉडी बिल्डिंग चार धड़ों मे बँट गई तो मजबूरन अमरजीत औरसुभाष भड़ाना जैसे समर्पित लोगों को पद त्यागने पड़े| इसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर चार-पाँच दुकानें खुल गईं |हैरानी वाली बात यह है कि विश्व स्तर पर भी इस खेल पर खुद का दावा करने वाले तीन -चार धड़े अस्तित्व मे हैं लेकिन सबका मकसद खाना-कमाना और अपने अपने डब्बे बेचना है | यही कारण है कि ओलंपिक और एशियाड से बॉडी बिल्डिंग को दूर कर दिया गया है| आईओसी जानती है कि जिस खेल मे डोप पॉजिटिव की भरमार है,उसे गले लगाना गला कटवाने समान है| दुख की बात यह है कि इस काला बाजार मे साफ-सुथरा काम करने वालों को भी एक ही चश्मे से देखा जाता है |

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2 comments

  1. Gym o nei ek taraf jaha body building aur exercise ko badhawa diya hai vahi dusri orr protein kei dabbei bechnei mei bhi peechei nhi hai. Sarkar ko iss baat per zarur niyantran krna hoga varna lakho cr i yuwao ko kidney liver kei faliure ko bhugatna hoga………….
    Ethics bhi koi cheez hoti hai….

    Ethics.

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  2. This is absolutely true.
    Gyms nd health clubs have become a lucrative business these days. See the gyms in every locality run by mafia like parking mafia, mining mafia, etc., etc., and people dear & near to the local politicians regardless of their status, in connivance with multinational companies manufacturing sport & power juices and dry protein products. These companies don’t care or follow the guidelines indicating list of banned items /medicines(chemicals) for use by sport persons issued by IOC from time to time.
    There had been instances in the past when banned drugs and syringes were found in camps organised by different sports agencies. This problem is prevailing globally because of new inventions of drugs and medicines and vested interests of big companies run by big people.

    Liked by 1 person

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