निपट कोरे निकले मेमनों का शिकार करने वाले!

निपट कोरे निकले मेमनों का शिकार करने वाले!

नई दिल्ली /राजेंद्र सजवान,
मेमनों का बेरहमी से शिकार करने वाली और शेर की तरह दहाड़ मारने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम को जब कोई टक्कर देने वाला मिला तो वही हुआ जैसा अक्सर होता आया है|

हांगकांग ,इंडोनेशिया और श्रीलंका जैसी मरियल टीमों को पीट कर रिकार्ड जीत पाने वाली भारतीय टीम अंदर से किस कदर खोखली है,मलेशिया ने दिखा दिया है| सच्चाई तो यह है कि भारतीय हॉकी प्रेमी और हॉकी जानकार यह माने बैठे थे कि गोल्ड मेडल पर भारत का नाम गुदा है और सेमी फाइनल और फाइनल महज खानापूरी हैं|लेकिन सारे सपने बिखर गये और टोक्यो ओलंपिक का सीधा टिकट भी छिन गया|

जकार्ता एशियाड के अत्यन्त रोमांचक सेमीफाइनल मुक़ाबले मे भारत की जीत पक्की मानी जा रही थी| उत्सुकता बस इस बात की थी कि भारत कितने गोल जमाता है|कमजोर टीमों पर धौंस जमाने वाले और मनमर्ज़ी से गोल जड़ कर रिकार्ड बनाने वाले इस कदर कमजोर साबित होंगे, शायद ही किसी ने सोचा होगा|खुद खिलाड़ी और कोच भी उँची उड़ान भर रहे थे| फाइनल रिज़ल्ट से पहले ही भारत को विजेता घोषित करने वालों की नींद तब टूटी जब पिद्दी से मलेशिया ने उठा कर पटक दिया|

जीहाँ, भारतीय हॉकी सातवें आसमान पर उड़ रही थीऔर यह भी भूल गई थी कि घमंड और अत्यधिक आत्मविश्वास का सिर हमेशा नीचा होता है और हो गया| जिस किसी ने मैच देखा, उसे पता चल गया कि भारतीय खिलाड़ियों मे दम नहीं है| सही मायने मे मलेशिया को तो निर्धारित समय मे ही जीत जाना चाहिए था| उसने खेल के हर क्षेत्र मे भारत को मात दी |पेनल्टी कार्नर,फील्ड गोलपर सही निशाने साधना तो दूर, भारतीय खिलाड़ी सही ढंग से बाल रोकना और सही पास देना भी भूल गये थे| रही सही कसर पेनल्टी शूटआउट मे पूरी हो गई| तमाम अनुभव खोखला साबित हुआ तो युवा खिलाड़ियों की भी पोल खुल गई| बेचारे कोच पर तरस आना स्वाभाविक है| बेहतर यह होगा कि आगामी विश्व कप के लिए नई टीम बनाई जाए| इन तिलों मे तेल नहीं रहा| भले ही अपनी मेजबानी मे विश्व कप जीत जाएँ पर एशियाड मे खेलने गई टीम विश्वास के लायक कतई नहीं है| ज़रूरी बदलाव नहीं किए तो ओलंपिक खेलने के लाले भी पड़ सकते हैं|

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