जब मुझे अपना कालम भेंट किया

जब मुझे अपना कालम भेंट किया

राजेंद्र सजवान,
‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूँ’, कुछ साल पहले तक यह संबोधन सुनते ही भारतीय खेल प्रेमी और आम नागरिक अपने रेडियो,टीवी से चिपक जाते थे| फिर चाहे स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का प्रसारण हो या हॉकी मैच या अन्य कोई खेल,जसदेव की बुलंद आवाज़ और कानों मे रस घोल देने वाली कमेंटरी को सुनकर असीम सुख की अनुभूति होती थी| लेकिन अब यह आवाज़ फिर कभी सुनाई नहीं देगी|

जसदेव के साथ ही हिन्दी कमेंटरी का एक युग समाप्त हो गया| स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्रदिवस,हॉकी और अन्य कई खेलों का रेडियो और टीवी प्रसारण उनकी आवाज़ के बिना आधा -अधूरा सा लगता था| ख़ासकर, उनकी आवाज़ भारतीय हॉकी का प्राण बनकर देशवासियों को गर्व की अनुभूति कराती रही|जिस किसी ने 1975 के हॉकी विश्व कप मे पाकिस्तान पर भारत की जीत का विवरण उनकी जानदार और शानदार आवाज़ मे सुना वह आजतक उस आवाज़ को भुला नहीं पाया होगा| कप्तान ,अजितपाल,साथी खिलाड़ियों अशोक ध्यानचन्द ,असलम शेर ख़ान आदि की मानें तो जसदेव ने अपनी बुलंद और दिलखुश आवाज़ से भारतीय हॉकी को पूरे देश का खेल बनाया|लगभग50 अवसरों पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर उनका रेडियो, टीवी प्रसारण देशवासियों मे देशभक्ति का संचार करता रहा|

जसदेव ने नौ ओलंपिक,आठ हॉकी विश्व कप और कई अन्य खेल आयोजनों का रेडियोऔर टीवी पर वृतांत सुनाया और दुनिया भर मे जाने-पहचाने गये| यह उनकी कमेंटरी का ही जादू था कि उन्हें पद्मश्री ,पद्म भूषण और ओलंपिक ऑर्डर जैसे सम्मान मिले|ऐसी दुर्लभ उपलब्धि पाने वाले वह देश के अकेले कमेंटेटर हैं|
अपना एक खेल कालम मुझे भेंट किया पिछले कुछ सालों से वह इसलिए परेशान रहते थे क्योंकि उनकी खबर लेने वाले ज़्यादा नहीं थे|जो शख्स कभी लाखों- करोड़ों दिलों की धड़कन रहा हो उसके लिए यह स्थिति सचमुच कष्टदाई है| लेकिन वह जयपुर से लगातार मुझसे फ़ोन पर बात करते थे| अक्सर यही कहा करते थे कि अब कोई पूछता नहीं है और सरकारी और ग़ैरसरकारी कार्यक्रमों मे उन्हें याद नहीं किया जाता| वह जान गये थे कि दुनियाँ किस कदर बेरहम है| जब लिखने- पढ़ने मे परेशानी हुई तो उन्होने दिल्ली प्रेस की एक मासिक पत्रिका का अपना खेल कालम मेरे नाम कर दिया, जिसे मैं कुछ साल पहले तक लिखता रहा| उनके द्वारा मेरे नाम की सिफारिश करना मेरे लिए एक बहुमूल्य सौगात है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता|

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