कबड्डी चले हॉकी की चाल

कबड्डी चले हॉकी की चाल

राजेंद्र सजवान
लगातार सात बार एशियाई खेलों मे कबड्डी खिताब जीतने के बाद जब जकार्ता एशियाड मे भारतीय पुरुष और महिला कबड्डी टीमों को क्रमशः कांस्य और रजत पदक ही मिले तो देशभर के खेल प्रेमियों और खेल जानकारों के मुख से अनायास ही निकला ,’कबड्डी चले हॉकी की चाल’| बेशक, एक समय भारतीय हॉकी का जलवा था| एक जमाना वह भी था जब भारतीय हॉकी को अजेय माना जाता था और ध्यानचन्द,बलबीर सिंह और दर्जनों अन्य खिलाड़ियों के रहते भारत को हॉकी का बेताज बादशाह कहा गया|तब आस्ट्रेलिया,जर्मनी,नीदरलैंड आदि देशों की हैसियत भारतीय हॉकी के सामने बहुत छोटी थी|

आठ बार के ओलंपिक चैम्पियन भारत की हॉकी की बादशाहत किसी से छिपी नहीं है| तीन बार आज़ादी से पहले 1928,32और 36 मे और तत्पश्चात 1948से 1956 तक तीन अवसरों पर लगातार भारतीय हॉकी ने ओलंपिक खिताब जीते| फिर 1964के टोक्यो ओलंपिक मे और आख़िरी बार 1980के मास्को ओलंपिक मे भारत विजयी रहा|इसके बाद की कहानी सुनाने लायक नहीं है|शुरुआती वर्षों मे पाकिस्तान,आस्ट्रेलिया,जर्मनी,नीदरलैंड और तत्पश्चात इंग्लैंड,स्पेन,अर्जेंटीना,बेल्जियम जैसे देश भी हॉकी मे ताक़त बन कर उभरे| कबड्डी मे भारत के सामने कोई भी एशियाई देश नहीं टिक पाया| लेकिन जकार्ता एशियाई खेलों मे ईरान ने पुरुषों और महिलाओं के खिताब जीत कर भारतीय एकाधिकार पर करारा तमाचा जड़ा है| कबड्डी मे विश्व स्तर पर बिना कुछ पाए ही कबड्डी का पतन शुरू हो गया है,जिसके लिए कबड्डी फेडरेशन और और कबड्डी लीग को कोसा जा रहा है| एक तरफ तो कबड्डी के कर्णधार अपने खेल को ओलंपिक दर्ज़ा दिलाने का दावा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ आलम यह है कि कोरिया और ईरान से पिटने का सिलसिला चल निकला है|

इसमे दो राय नहीं कि फेडरेशन ने कबड्डी को एक लोकप्रिय खेल बनाने मे बड़ी भूमिका निभाई,प्रो.लीग के चलते खिलाड़ियों को लाखों से करोड़ों तक दिलाए| लेकिन साथ ही शुरू हुआ टीमों के चयन का गोरख धंधा| राष्ट्रीय टीम मे चुने जाने के लिए लाखों की माँग किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं| कुछ खिलाड़ियों ने अपने पूर्व अध्यक्ष पर कई अन्य गंभीर आरोप लगाए हैं| हार-जीत खेल का हिस्सा हैं पर खिलाड़ियों के चयन मे सौदेबाज़ी और अन्य अनियमितताओं के चलते कबड्डी की बदनामी हो रही है| मामला कोर्ट तक जा पहुँचा है और फेडरेशन के समानांतर एक और धड़ा उठ खड़ा हुआ है,जोकि अपनी समानांतर लीग आयोजित करने का दम भर रहा है|हॉकी की बर्बादी भी कुछ इसी स्टाइल मे शुरू हुई थी और अब एशिया मे भी श्रेष्ठ नहीं रहे|कबड्डी की चाल भी कुछ वही दिखाई पड़ रही है|

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