हॉकी दिल्ली:खेलें तो कहाँ?

हॉकी दिल्ली:खेलें तो कहाँ?

राजेंद्र सजवान,
एक तरफ तो देश की सरकार और राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के नारे उछाल कर वाह वाह लूटने का कोई मौका नहीं चूकतीं तो दूसरी तरफ आलम यह है कि खेलने की बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं| दिल्ली और देश की हॉकी कुछ इसी प्रकार के अभावों से जूझ रही है|जानकारों की राय मे भारतीय हॉकी के पतन का बड़ा कारण स्टेडियमों की भारी कमी है|ख़ासकर,देश की राजधानी और राज्य का दर्जा प्राप्त दिल्ली मे हॉकी दम तोड़ने की कगार पर है|

हॉकी को घास को छोड़े चार दशक से भी अधिक समय बीत चुका है|दुनिया के अमीर-ग़रीब सभी देश घटिया-बढ़िया एस्ट्रो टर्फ पर हॉकी खेल रहे हैं|लेकिन भारत की राजधानी का आलम यह है कि हॉकी के दो स्टेडियम होने के बावजूद भी खिलाड़ी दर दर भटक रहे हैं| नई दिल्ली पालिका परिषद का शिवाजी स्टेडियम और भारतीय खेल प्राधिकरण का ध्यानचन्द नेशनल स्टेडियम ना सिर्फ़ भारतीय हॉकी को मुँह चिढ़ा रहे हैं अपितु खेल मंत्रालय,दिल्ली सरकार,भारतीय खेल प्राधिकरण,पालिका परिषद और दिल्ली हॉकी संघ की कथनी और करनी की पोल खोल रहे हैं| दिल्ली के स्कूलों,कालेजों,संस्थानों और अन्य के लिए दो बड़े स्टेडियमों के दरवाजे लगभग बंद पड़े हैं| हॉकी प्रेमियों ने तो वर्षों पहले नाता तोड़ लिया था| खेलों की हितैषी होने का दावा करने वाली सरकार ने नेशनल स्टेडियम मे अपने एक मंत्रालय का दफ़्तर खोल कर हॉकी को दर बदर कर दिया है तो शिवाजी स्टेडियम पालिका एवम् हॉकी इकाइयों के अहम की लड़ाई का मैदान भर रह गया है|

कुछ साल पहले तक दिल्ली हॉकी का गढ़ था| नेहरू,शास्त्री,रंजीत सिंह और अन्य कई टूर्नामेंट नियत समय पर आयोजित किए जाते रहे| दिल्ली हॉकी लीग,सांस्थानिक लीग और कई आयोजन शिवाजी स्टेडियमसे गायब हो चुके हैं| साल भर व्यस्त रहने वाला स्टेडियम लगभग खामोश हो गया है| ऐसे मे दिल्ली के खिलाड़ी खेलें तो कहाँ?बेशक, यही हाल देश के अन्य राज्यों का भी है| तो फिर हॉकी मे पिछड़ने का कारण इधर-उधर क्यों खोजा जाता है?स्कूल और कालेज आज भी प्लास्टिक की घास वाले मैदानों की बाट जोह रहे हैं|

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