चैम्पियनों को भुला दिया–अशोक ध्यानचन्द

चैम्पियनों को भुला दिया–अशोक ध्यानचन्द

राजेंद्र सजवान,
जिन चैम्पियनों को आज भारतीय हॉकी सिखाने पढ़ाने का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए था उनकी हालत यह है कि ज़्यादातर या तो गुमनामी का जीवन जी रहे हैं या कहीं किसी स्कूल,कालेज या अकादमी से जुड़ कर रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं| ऐसे ही एक महान ओलंपियन और विश्वविजेता हैं -अशोकध्यानचन्द जोकि इंडियन एयर लाइन्स से रिटायर होकर अजमेर मे राजस्थान की बालिका हॉकी अकादमी से जुड़े हैं|

अशोक सिर्फ़ इसलिए बड़ा नाम नहीं क्योंकि वह दद्दा ध्यानचन्द के सुपुत्र हैं अपितु उनके अपनी अलग पहचान रही है| 1975 मे भारतीय टीम द्वारा जीते गये एकमात्र विश्वकप मे वह हीरो बनकर उभरे थे| क्‍वालालंपुर मे खेले गये फाइनल मे अशोक ने पाकिस्तान पर मिली 2-1 की जीत का विजयी गोल जमाया था| ओलंपिक मे भी उनके प्रदर्शन को सराहा गया| वही अशोक कुमार आज की भारतीय हॉकी को लेकर नाखुश हैं| एक साक्षात्कार मे उन्होने कहा कि आज खिलाड़ियों को क्या नहीं मिल रहा! सरकार उन पर करोड़ों खर्च कर रही है| हर खिलाड़ी को अच्छी नौकरी ,दैनिक भत्ता और तमाम राष्ट्रीय खेल अवॉर्ड दिए जा रहे हैं जबकि उनके जमाने के कई खिलाड़ी अभाव का जीवन जी रहे हैं| उन्हें सरकार या हॉकी इंडिया कोई भी नहीं पूछते औरउनके अनुभव से कोई फ़ायदा नहीं उठाना चाहता|

उनकी राय मे हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचन्द को भारत रत्न नहीं देना इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और शायद भारतीय हॉकी को भी उनकी उपेक्षा की सज़ा मिल रही है|भारतीय हॉकी की वर्तमान फार्म को लेकर वह चिंतित हैं और मानते हैं कि भुवनेश्वर मे खेला जाने वाला विश्व कप भारतीय हॉकी की दशा-दिशा तय करेगा| ऐसा सुनहरी मौका शायद फिर कभी मिले| अशोक ने एक बार फिर दोहराया कि पुराने खिलाड़ियों के पास ऐसा बहुत कुछ है जिसकी मदद से नये खिलाड़ी आगे बढ़ सकते हैं| लेकिन पता नहीं क्यों सरकार और हॉकी के कर्णधार चन्द लोगों के हाथों खेल रहे हैं| जकार्ता एशियाड मे तीसरा स्थान बताता है कि भारतीय हॉकी गर्त मे जा रही है और उसे अगला विश्व कप ही उबार सकता है|

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