भारत मेँ ओलम्पिक आंदोलन:दो कदम आगे,चार कदम पीछे !

भारत मेँ ओलम्पिक आंदोलन:दो कदम आगे,चार कदम पीछे !

राजेंद्र सजवान,
कुछ साल पहले तक भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक खेलों मे इसलिए भाग लेने जाते थे क्योंकि तब तक ओलंपिक आंदोलन की मूल भावना भाग लेने तक सीमित थी| तब तक यूरोप और अमेरिका के अग्रणी देश अधिकांश खेलों मे अपना वर्चस्व बनाए थे| एशियाई शक्ति के रूप मे चीन के उदय ने ओलंपिक भावना को श्रेष्ठ और सर्व श्रेष्ठ का रंग दिया और यहाँ तक कहा जाने लगा कि अमेरिका और चीन इसलिए महाशक्ति हैं क्योंकि ओलंपिक खेलों मे उनकी प्रतिस्पर्धा ने बाकी देशों को बहुत पीछे छोड़ दिया है| इस दौड़ मे भारत कहाँ है और भारत मे ओलंपिक आंदोलन की क्या स्थिति है,जैसे गंभीर विषय पर राजधानी के किरोडी मल कालेज ने खेल एवम् युवा मामलों के मंत्रालय की निगरानी मे एक अंतरराष्ट्रीय कान्फरेन्स का आयोजन किया जिसमे देश विदेश के खेल एक्सपर्ट्स,खिलाड़ी,कोच,खेल प्रशासक,प्रोफ़ेसर आदि ने भाग लिया और ओलंपिक मे भारतीय पक्ष और भारतीय मूल्यों पर चर्चा की गई|सभी ने माना कि इस दिशा मे भारत दो कदम आगे बढ़ता है तो अगले ही पल चार कदम पीछे हट जाता है| ऐसा क्यों हो रहा है,जानने की कोशिश की गई|

तीन दिन तक चले इस सम्मेलन की आयोजक सचिव केएम कालेज की शारीरिक शिक्षा निदेशक डाक्टर बेनू गुप्ता के अनुसार इस आयोजन मे नाडा के महानिदेशक नवीन अग्रवाल,हॉकी द्रोणाचार्य अजय बंसल,कनाडा के रिचर्ड कू,कबड्डी द्रोणाचार्य सुनील डबास,हॉकी ओलंपियन ज़फ़र इकबाल, फुटबॉल एक्सपर्ट नोवी कपाड़िया और अन्य कई हस्तियों ने इस आयोजन मे भाग लिया और ओलंपिक मे भारतीय भागीदारी पर विस्तार से चर्चा की गई| सभी ने एक राय से माना कि भारत ने ओलंपिक आंदोलन की दिशा मे कदम बढ़ाए हैं किंतु अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है|देश विदेश के खेल विद्वानों ने एकराय से माना कि भारतीय खिलाड़ियों को प्रयाप्त प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा | ख़ासकर, ग्रासरूट स्तर पर खामियाँ पाई गई हैं| स्कूल-कालेजों मे खेल को अनिवार्य विषय सिर्फ़ कागजों तक बनाया जा सका है और पढ़ाई और खेल के बीच सही तालमेल की कमी के चलते भारतीय युवा खेल को करियर नहीं बना पा रहे| देश मे स्पोर्ट्स कल्चर की कमी है तो खेलों के लिए सरकारी बजट भी काफ़ी कम है| उद्योग जगत हालाँकि कुछ खेलों को बढ़ावा दे रहा है किंतु इन प्रयासों मे दिखावा ज़्यादा है और खर्च बहुत कम किया जाता है|

सम्मेलन मे भाग लेने वाले सभी खेल जानकारों ने एक राय से माना कि ओलंपिक आंदोलन को अपनाने और चरितार्थ करते वक्त भारतीय मूल्यों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए| यह जान लेने की ज़रूरत है क़ि हमारे खिलाड़ी किन परिवारों से आते हैं और उनको सिखाने -पढ़ाने के लिए कैसा माहौल दिया जाए| इस प्रयास मे माता-पिता,खिलाड़ी,स्कूल और संस्थानों कोअपनी भूमिका का निर्वाह ईमानदारी से करना होगा, तब जाकर भारत ओलंपिक खेलों की ताक़त बन पाएगा|

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