पैरा खिलाड़ियों की उँची छलाँग

पैरा खिलाड़ियों की उँची छलाँग

नई दिल्ली/ राजेंद्र सजवान
देशवासी जकार्ता एशियाई खेलों मे अपने खिलाड़ियों की जीत का जश्न पूरी तरह मना भी नहीं पाए थे कि अपने पैरा एथलीटों ने पैरा एशियाई खेलों मे रिकार्डतोड़ प्रदर्शन से खुशियाँ डबल कर दी हैं| उन्होंने साबित कर दिया है कि वह सामान्य खिलाड़ियों से किसी मामले मे कम नहीं हैं|जकार्ता एशियाई खेलों मे भारत ने अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया तो पैरा खिलाड़ियों ने उनसे भी चार कदम आगे बढ़ाए और 15स्वर्ण,24रजत,23कांस्य सहित कुल 72 पदक जीत कर सभी रिकार्ड पोंछ डाले| इसके साथराष्ट्रीय खेल अवार्डों को लेकर अपनी तरह की एक नई बहस भी शुरू हो गई है
पैरा खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन बताता है कि यदि उन्हें लगातार अवसर दिए जाएँ और सामान्य खिलाड़ियों की तरह ट्रीट किया जाए तो उनकी योग्यता और दमखम से देश का नाम और रोशन हो सकता है| लेकिन उनकी कामयाबी से सरकार और सरकारी एजेंसियों की चिंता भी बढ़ गई है| ख़ासकर, खेल मंत्रालय और उसकी राष्ट्रीय खेल अवॉर्ड कमेटियों को फ़ैसले ले पाने मे परेशानी पेश आ रही है|

जब से राष्ट्रीय खेल अवॉर्ड दिए जाने की परंपरा शुरू हुई है शायद ही कोई साल ऐसा गुजरा हो जब विवाद ना हुए हों| अब चूँकि पैरा खिलाड़ी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, ऐसे मे उनका दावा पहले से ज़्यादा बनता है| ज़ाहिर है पैरा और अन्य के बीच खींचतान भी हो सकती है| द्रोणाचार्य,खेल रत्न,अर्जुन और ध्यानचन्द अवार्डों पर पिछले कुछ सालों से पैरा खिलाड़ियों का दावा मजबूती के साथ पेश किया जाता रहा है| उनका मानना है कि जब एशियाई और ओलंपिक खेलों मे उनके पदक लगातार बढ़ रहे हैं तो अवार्ड के हकदारों की संख्या भी बढ़नी चाहिए| लेकिन ऐसा हो नहीं रहा| नतीजन कई पैरा खिलाड़ी नाराज़गी जाहिर करते हैं तो कुछ एक बग़ावत पर उतर आते हैं|खेल एक्सपर्ट और कुछ हटकर सोचने वाले कह रहे हैं कि अब खेल अवार्डों को विस्तार देने का वक्त आ गया है| यह भी कहा जा रहा है कि खेल अवार्डों को दो अलग वर्गों मे बाँट देना चाहिए ताकि अधिकाधिक पैरा खिलाड़ी सम्मान के साथ अपना हक पा सकें|

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