अवसरवादियों और पाखंडियों की पोल खोल गये सेठी जी

अवसरवादियों और पाखंडियों की पोल खोल गये सेठी जी

राजेंद्र सजवान,
देश के वरिष्ठतम,बेहद सादा और सच्चे, विनम्र और नेक दिल पत्रकार ,आदरणीय रोशन सेठी जी हमारे बीच नहीं रहे| उनका जाना खेल पत्रकारिता के लिए कितनी बड़ी क्षति है इसका अहसास उन खिलाड़ियों,कोचों,खेलसंघों और खेल संगठनों को ज़रूर होगा जिनको स्वर्गीय सेठी जी ने मरते दम तक अपनी कलम से जिंदा रखा|लगभग दस सालों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था| कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से जूझते रहे| तीन बार कैंसर को हराया लेकिन कब तक? मृत्यु तो एक दिन होनी ही थी, कैंसर तो सिर्फ़ बहाना भर है|

यारों के यार,जीदार,जीवट और हँसमुख सेठी जी चले गये लेकिन हमारे आपके लिए एक सबक सबक छोड़ गये हैं| वह यह कि इस दुनियाँ मे जीते जी सब अपने हैं पर आँख बंद होते ही सिर्फ़ वही आपको याद करते हैं जिन्होने आपको अपने दिल दिमाग़ से चाहा और आपके साथ निस्वार्थ भाव से जुड़े रहे| जिस इंसान ने अपने जीवन के पचास से अधिक साल खेलों और खिलाड़ियों की सेवा मे लगा दिए उसकी अंतिम यात्रा मे पचास-साठ लोग भी मौजूद नहीं थे|हो सकता है कुछ एक की अपनी विवशता रही होगी| कई एक अवसरों पर हम आप भी अपने प्रियजन के लिए समय नहीं निकल पाते| लेकिन जिन पहलवानों,गुरु ख़लीफाओं,अखाड़ेबाजों, यहाँ तक कि असली और नकलियों को उन्होने ज़ीरो से हीरो बनाया उनमे से एक भी उनके दाह संस्कार पर नज़र नहीं आया| जो पावर लिफ्टर,बाडी बिल्डर और तमाम खिलाड़ी और कोच उन्हें पिताजी कहते नहीं थकते थे,उनकी बीमारी और अंतिम यात्रा से दूर रहे|

अक्सर हम किसी भी महान आत्मा या आम इंसान की मौत पर कहते हैं,”उनके जाने से देश,समाज,संस्था को भारी क्षति होगी और उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी”| हालाँकि पीठ पीछे कुछ और कहने और ताने कसनेकी हमारी आदत रही है | लेकिन सेठी जी के बारे मे मैं गारंटी से कह सकता हूँ कि उनके जाने के बाद बहुत से खेल,खिलाड़ी,खेल आयोजक,अधिकारीऔर खेल संस्थाएँ अनाथ ज़रूर हो जाएँगे| कारण, वह उस जमाने के पत्रकार थे, जब सही मायने मे खेलों को ग्रासरुट स्तर से प्रोमोट किया जाता था| तब मीडिया का धर्म स्थानीय खेल-खिलाड़ियों को प्रोमोट करने का होता था| इस धर्म और महान कर्तब्य को उन्होने आख़िर तक और बिस्तर पर लेटे हुए भी निभाया|स्थानीय फुटबॉल, हॉकी,क्रिकेट,कुश्ती,बास्केटबाल,एथलेटिक,खो-खो,कबड्डी और तमाम खेलों को उन्होने सांध्य टाइम्स मे यथोचित स्थान दिया| उस समय जबकि देश और ख़ासकर दिल्ली के सभी समाचारपत्रों ने स्थानीय खेलों को छापना पूरी तरह बंद कर दिया है,सेठी जी स्थानीय खिलाड़ियों को रोशनी दिखाते रहे|सही मायने मे पत्रकारिता के असल मूल्यों और पत्रकार के धर्म को निभाने वाले वह आख़िरी इंसान बचे थे|
हालाँकि अंतिम समय मे उन्हें इस बात का अफ़सोस ज़रूर रहा कि उनकी सेवाओं का लाभ उठाने वाले कभी पलट कर हाल तक नहीं पूछते|लेकिन उन्होने कभी किसी को कड़ुवा शब्द नहीं कहा|यही नाराज़गी मुझसे भी थी कि मैं बहुत कम उनकी खोज खबर लेता था|

चूँकि मैं उनके बेहद करीबी,प्रिय और पुत्र एवम् मित्र जैसा रहा हूँ इसलिए उन्हें बेहतर समझ पाया हूँ| सचमुच उनके जाने के बाद खेल पत्रकारिता का एक अध्याय समाप्त हो गया है| स्वर्गीय सुशील जैन सर के बाद हमने देश का दूसरा सबसे बड़ा,लड़ाकू और जीदार पत्रकार खोया है| हम आपको कभी नहीं भुला पाएँगे पिताजी|

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