ग्रीको रोमन से भद्दा मज़ाक

ग्रीको रोमन से भद्दा मज़ाक

राजेंद्र सजवान,
कुश्ती विश्व चैंपियनशिप मे बजरंग पूनिया ने सिल्वर और पूजा ढाडा ने ब्रोंज़ मेडल जीत कर भारत को खाली हाथ लौटने ज़रूर बचा लिया किंतु साथ ही कुछ ऐसे सवाल भी खड़े किए हैं जिनको लेकर भारतीय कुश्ती फेडरेशन कभी भी गंभीर नहीं रही है| फेडरेशन बार बार कहती है कि भारतीय कुश्ती लगातार प्रगति कर रही है परंतु बुडापेस्ट मे आयोजित विश्व चैंपियनशिप मे मिले पदक नाकाफ़ी हैं| सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ग्रीको रोमन शैली के पहलवान बार बार अपयश बटोर रहे हैं|

सवाल यह पैदा होता है कि ग्रीको रोमन को कब तक ढोते रहेंगे? हालाँकि एशियाड और कामनवेल्थ खेलों की तरह ग्रीको रोमन शैली को ओलंपिक का दर्जा प्राप्त है| लेकिन विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक मे भारतीय पहलवानों का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है| विश्व चैंपियनशिप मे भाग लेने गये तीनों पहलवान पदकों की दौड़ मे शामिल होने से पहले ही बाहर हो गये| अफ़सोस की बात यह है कि गुरप्रीत और नवीन पहले ही मुक़ाबले मे हार कर बाहर हो गये| हरदीप मात्र एक जीत दर्ज कर पाया|

ग्रीको रोमन की बदहाली को लेकर यह कहा जा रहा है कि फेडरेशन इस शैली के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है| पहलवानों को बेहतर कोच और अन्य सुविधाएँ नहीं मिल पा रहीं|ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इस शैली के अधिकांश पहलवान फ्री स्टाइल के नाकाम हैं और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है| कुछ पहलवानों और कोचों के अनुसार उन्हें फ्रीस्टाइल पहलवानों से ना सिर्फ़ कमतर आँका जाता है अपितुफेडरेशन भी उनके साथ सौतेला व्यवहार करती है| फिर भला पदक कैसे जीत सकते हैं?

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