घमंड का सिर नीचा:

राजेंद्र सजवान,
एशियन कप के लिए रवाना होने से पहले आयोजित एक प्रेस कान्फरेन्स मे जब मैने भारतीय स्टार खिलाड़ी सुनील छेत्री से पूछा कि टीम उनके प्रदर्शन पर निर्भर है तो कोई दबाव महसूस कर रहे हैं ? सुनील ने सादगी दिखाते हुए कहा,’सर टीम मे कई अच्छे खिलाड़ी हैं और मैं अकेला स्टार नहीं हूँ|’ उसने कुछ खिलाड़ियों का नाम भी लिया|तभी एआईएफएफ अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने सुर्रा छोड़ा कि भारत 2026 के वर्ल्ड कप मे खेलेगा| टीम कोच स्टीफ़न कोन्स्टेनटाइन ने बस इतना कहा कि हम नाक आउट मे स्थान बनाने जा रहे हैं| लेकिन सुनील चला नहीं और यूएई एवम् बहरीन से हार गये| पटेल साहब का सपना भी लगभग चूर-चूर हो चुका है और कोच की कथनी सही साबित नहीं हुई|

ग्रुप टाप करने की हुंकार भरने वाली और चार-आठ सालों मे वर्ल्ड कप खेलने का दम भरने वाली भारतीय फुटबॉल रो-धोकर और गले ना उतरने वाली बयानबाज़ी कर अपनी नाकामी को दबाने की कोशिश भले ही करे लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय फुटबॉल मे चैम्पियनों जैसादम नहीं है|

बेशक, भारत ने थाईलैंड के विरुद्ध शानदार जीत दर्ज की पर यूएई और बहरीन से हारने पर भाग्य को कोसना काफ़ी नहीं है|देखा जाए तो भारत को अत्यधिक आत्मविश्वास और बड़बोलापन ले डूबा| फुटबॉल की थोड़ी भी समझ रखने वाले जानते हैं कि यह एक टीम खेल है और मात्र सुनील छेत्री, संधु या झिन्गन टीम की नैया पार नहीं लगा सकते| यह सही है की भारतीय खिलाड़ियों ने एक टीम के रूप मे खेलना सीख लिया है और उनकी फिटनेस बेहतर हुई है लेकिन हम यह भूल रहे हैं कि बाकी देश पहले ही हमसे सालों आगे हैं और उन्होने अत्याधुनिक फुटबॉल के गुर सीख लिए हैं|यूएई और बहरीन ने दिखाया कि कैसे मैच जीते जाते हैं| भारतीय टीम की एक उपलब्धि यह रही कि उसने थाईलैंड को हराया वरना यह टीम कहीं से भी विश्वस्तरीय नज़र नहीं आई|

भारतीय फुटबॉल टीम की नाकामी के पीछे एक बड़ा कारण कुछ अवसरवादियों और खेल की आड़ मे धंधा करने वाली कंपनियों का खेल भी रहा है|जिन्हें फुटबॉल की एबीसी नहीं आती वह टीवी चैनलों पर दावा कर रहे हैं कि भारत 2022 का वर्ल्ड कप खेल सकता है| ऐसे एक्सपर्ट्स को या तो अपनी फुटबॉल की सही जानकारी नहीं या झूठ बोल कर अपने स्वार्थ साध रहे हैं| यह ना भूलें क़ी इस टीम पर पूरे देश की उम्मीदें लगी थीं| करोड़ों खर्च किए गये , झूठे सपने दिखाए गये और नतीजा वही ज़ीरो|अर्थात अब एक बार फिर ज़ीरो से शुरू करना पड़ेगा|बेशक, आगे की डगर बहुत मुश्किल होने वाली है| चार साल बाद फिर से एएफसी कप खेलना पड़ेगा और कोई गारंटी नहीं कि कामयाबी मिल पाएगी| लेकिन तब तक शायद सुनील छेत्री जैसा भरोसे का खिलाड़ी भी जारी ना रख पाए|कोच स्टीफ़न कोन्स्टेनटाइन ने तो पहले ही पीठ दिखा दी है|टीम मे कई बदलाव हो सकते हैं| सीधा सा मतलब यह है कि भारतीय फुटबॉल ने जहाँ से आगे बढ़ने का सिलसिला शुरू किया था वहीं आ खड़ी हुई है|

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