हॉकी चौराहे पर

राजेंद्र सजवान,
भारतीय हॉकी एक बार फिर वहाँ जा खड़ी हुई है जहाँ से आगे बढ़ने का रास्ता साफनज़र नहीं आ रहा| ऐसा स्वाभाविक भी है| जो देश कभी हॉकी का बेताज बादशाह था और जिसके पास आज एशियाड, कामनवेल्थ, ओलंपिक और वर्ल्डकप जैसा कोई भी खिताब नहीं है तो फिर उसके बारे मे तो यही कहा जाएगा कि उसे ज़ीरो से शुरू करना पड़ेगा|

गये साल मे भारतीय हॉकी ने जितना अपमान और अपयश बटोरा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय हॉकी ने पिछले कई सालों मे कोई प्रगति नहीं की है| हो सकता है कि हॉकी इंडिया और उसके करीबियो की सोच का मापदंड हटकर हो लेकिन आम हॉकी प्रेमी अपनी राष्ट्रीय टीम के शर्मनाक प्रदर्शन से बेहद दुखी है| जो देश कभी आस्ट्रेलिया, हालैंड, जर्मनी जैसे देशों को आसानी से हराता था उसे कभी बेल्जियम हरा देता है तो कभी दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया जैसी टीमों के सामने हथियार डालने पड़ रहे हैं| जिस देश को अपने कोच और गुरुओं ने बड़ी ताक़त बनाया उसे देसी-विदेशी कोच बदलने की बीमारी सी लग गई है|

एकदम फ्लाप कोच साबित हुए हरेन्द्र सिंह को सीनियर से हटाकर जूनियर टीम का डायत्व सौंपा जा रहा है,जिसके लिए वह राज़ी नहीं हैं| एशियाई खेलों और वर्ल्ड कप मे भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखते हुए हरेन्द्र का जाना तय माना जा रहा था| लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कोई नया कोच टीम मे नयापन भर देगा|जिस टीम को जेरार्ड राक, माइकल नोब्स, रोलेंट ओल्तमस और रिक चार्ल्सवर्थ जैसेविदेशी कोच नहीं सुधार पाए उसके बारे मे तो यही कहा जा सकता है कि कोई चमत्कार ही भारतीय हॉकी को सही दिशा दे सकता है|

कुछ साल पहले तक भारतीय खिलाड़ी सुविधाओं का रोना रोते थे| थोड़ा पीछे चलें तो खराब अंपायरिंग का बहाना बनाया गया| कुछ एक अवसरों पर एफआईएच और गोरे देशों की साजिश होने जैसे आरोप भीलगाए गये| लेकिन अब कोई बहाना नहीं चलने वाला| खिलाड़ी लाखों मे खेल रहे रहे हैं और हर प्रकार की सुविधाओं का सुखभोग कर रहे हैं|हॉकी प्रेमी चाहते हैं कि चयन

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