पदमश्री सुनील छेत्री

पदमश्री सुनील छेत्री

राजेंद्र सजवान
(सुनील छेत्री को मैं तब से जानता हूँ जब वह मात्र 12-13 साल का था और आर्मी पब्लिक स्कूल के लिए देवरानी कप में खेलने मोती बाग स्कूल आता था।सच बताऊं तो यह लड़का मुझे पहली ही नजर में भा गया था। मेरे सुझाव पर ममता मॉडर्न स्कूल ने उसे अपने दल में शामिल किया और इसके बाद सुनील ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।)

फुटबॉल टीम के कप्तान और सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ियों मे स्थान पा चुके सुनील छेत्री को पदमश्री पुरस्कार से नवाजा जाना भारतीय फुटबॉल के लिए गौरवशाली अवसर कहा जा सकता है|यूँ तो देश के अनेक खिलाड़ी पद्‌मश्री सम्मान पा चुके हैं लेकिन सुनील के पुरस्कार से भारतीय फुटबॉल का सम्मान बढ़ा है| वह उन बिरले खिलाड़ियों मे स्थान पाने मे कामयाब हुआ है जिसने अपने प्रदर्शन और पराक्र्म से अपने खेल को ना सिर्फ़ खेला और जिया अपितु उसे बर्बादी की कगार से खींच कर मुख्य धारा से जोड़ने मे सफल रहा है|

अक्सर जब कभी भी राष्ट्रीय खेल पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा होती है तो ज़्यादातर को लेकर आरोप लगाए जाते हैं और उसमे राजनीति को खोजा जाता है लेकिन सुनील ऐसा खिलाड़ी है जिसे पद्‌म सम्मान दिए जाने पर ना सिर्फ़ फुटबॉल प्रेमी रोमांचित हैं,बल्कि देश के उभरते खिलडी अपने राष्ट्रीय हीरो को सलाम कर रहे हैं| ऐसा इसलिए है क्योंकि सुनील उस पीढ़ी का फुटबॉल योद्धा है जब भारतीय फुटबॉल अपनी पहचान खो चुकी थी,फेडरेशन और सरकार के तमाम प्रयास विफल हो रहे थे| उसके उदय के साथ भारत ने फुटबॉल मे अपनी पहचान बनानी शुरू की और देखते ही देखते फ़ीफ़ा रैंकिंग मे भारत लगातार सम्मान अर्जित करता चला गया|यह सब सुनील के नेतृत्व,खेल कौशल,साथी खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने और टीम भावना से संभव हो पाया| भारतीय खेल इतिहास मे वह एकमात्र ऐसा खिलाड़ी है जिसने खाली पड़े स्टेडियमों को अपनी विनम्रता और व्यवहार कुशलता से भर दिया| उसने हाथ जोड़ कर फुटबॉल प्रेमियों को मैदानों की तरफ लौटाया| ऐसा करिश्माई खिलाड़ी भारत मे किसी भी खेल मे शायद ही पैदा हुआ हो|

कुश्ती को सम्मान दिलाने मे जो योगदान सुशील और योगेश्वर का रहा है,मैरी काम,सिंधु,सायना,लियान्डर पेस,बिजेंद्र,बिंद्रा आदि के ओलंपिक पदकों ने उनके खेल को जैसा गौरव प्रदान किया, सुनील के करिश्मे से भारतीय फुटबॉल उसी प्रकार लाभान्वित हुई है| हालाँकि उसके रहते भारतीय फुटबॉल ने ना तो ओलंपिक पदक जीता और ना ही विश्व स्तर पर कोई उपलब्धि पाई है| फिरभी उसने भारतीय फुटबॉल को जोकुछ दिया उसकी कोई कीमत नहीं आँकी जा सकती| यही कारण है कि फिसड्डी भारतीय फुटबॉल के इस सपूत की तुलना मेस्सी और रोनाल्डो से की जाती है|

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