मार्शल आर्ट्स: खेल के नाम पर लूट

राजेंद्र सजवान,
जब कभी ओलंपिक या एशियाड मे पदकों की बात चलती है तो हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग, एथलेटिक, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, वेटलिफ्टिंग, टेनिस और कुछ एक अन्य खेलों के बारे मे चर्चा होती है| राष्ट्रमंडल या हल्के स्तर के आयोजनों की बात की जाय तो बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, जिमनास्तिक, तैराकी, हैंडबॉल, फुटबॉल आदि खेलों मे संभावनाओं को तलाशा जाता है| लेकिन भारत मे ऐसे बहुत से खेल खेले जा रहे हैं जिनकी चर्चा ना तो सरकार चाहती है और नाही खेल संघ और खिलाड़ी अपनी अनदेखी का रोना रोते हैं|ऐसे खेलों को मार्शल आर्ट्स नाम दिया गया है जिनमे से दो-तीन खेल एशियाड और ओलंपिक का हिस्सा भी हैं|

हाल ही मे एक सर्वे से पता चला है कि देश मे क्रिकेट और फुटबॉल के बाद जो खेल सर्वाधिक खेले जाते हैं या जिनमे खिलाड़ियों की भागीदारी अन्य की तुलना मे अधिक है, उनमे जूडो, कराटे, तायकवांडो, किक बॉक्सिंग, चोई क्वांग डो, जीत कुनेडो, स्के मार्शल आर्ट्स, थांग टा, सेपक टकरा और अन्य मार्शल आर्ट्स खेल शामिल हैं| देशभर मे लाखों बच्चे और युवा इन खेलों से जुड़े हैं| ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अधिकांश स्कूल इन खेलों को आत्मरक्षा की दुहाई देते हुए शुरुआत से अपना लेते हैंऔर बच्चों का भविष्य खराब करते हैं|स्कूल, फेडरेशन, कोच और यहाँ तक कि भारतीय खेल प्राधिकरण से जुड़े लोग मिलीभगत कर इन खेलों को अनावश्यक बढ़ावा देते आ रहे हैं| हालाँकि मार्शल आर्ट्स खेलों मे एशियाड, ओलंपिक या बड़े आयोजनों के पदक जीतने की महत्वकांक्षा कभी नहीं देखी गई| लेकिन इन खेलों का चलन इसलिए ज़्यादा है क्योंकि इनकी आड़ मे खाने-कमाने का धंधा जोरों पर चल रहा है| स्कूल,स्कूल गेम्स फेडरेशन,राष्ट्रीय फेडरेशन,राज्य और राष्ट्रीय इकाइयाँ और यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे खेलों के कई समान्तर धड़े अपना अपना झंडा लिए खड़े हैं और खिलाड़ियों का भविष्य खराब कर रहे हैं| अधिकांश अपनी दावेदारी के लिए कोर्ट कचहरी मे लड़ भिड़ रहे हैं|

जूडो,तायकवांडो और वुशु मे हालात अपेक्षाकृत बेहतर हैं| ख़ासकर,वुशु मे अंतरराष्ट्रीय पदक मिले हैं| बाकी मे साल दर साल हालात बिगड़ रहे हैं| खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ चुपचाप तमाशा देख रहे हैं|कभी कभार माहौल इस कदर बिगड़ जाता है कि एशियाड और अन्य अंतरराष्ट्रीय आयोजनों मे भागीदारी संभव नहीं हो पाती| ऐसे बिगड़ैल खेलों मे फ़साद की जड़ स्कूल गेम्स फेडरेशन को माना जाता है,जिसने देश के स्कूली खेलों को कभी भी सही दिशा नहीं दी|

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