भारतीय फुटबॉल का असंतोष 

  राजेंद्र सजवान,

   फिलहाल यह गारंटी से नहीं कहा जा सकता कि आईएसएल के आयोजन के बाद से भारतीय फुटबॉल मे बदलाव आया है और हमारे खिलाड़ियों के प्रदर्शन मे सुधार हो रहा है| इतना तय है कि जब से आई लीग और आईएसएल जैसे आयोजनों की शुरुआत हुई है भारतीय फुटबॉल के कर्णधारों ने राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों,बड़े टूर्नामेंटों और ग्रासरूट फुटबॉल की अनदेखी शुरू कर दी है| थोड़ा पीछे मुड़ . कर देखें तो देश के कई स्थापित टूर्नामेंट बंद हो गये हैं या दम तोड़ रहे हैं| बस अब राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप(संतोषट्राफ़ी)आखरी साँसें ले रही है| इसे खानापूरी बना दिया गया है|

     एक जमाना था जब राष्ट्रीय चैंपियनशिप के आधार पर खिलाड़ी जाने पहचाने जाते थे|उनकी  पहचान राष्ट्रीय टीम, मोहंबागान,ईस्ट बंगाल,जेसीटी आदि क्लब या बंगाल,पंजाब,गोवा,महाराष्ट्र,केरल,कर्नाटक,आंध्र आदि राज्यों के लिए खेलने पर होती थी| लेकिन आज आईएसएल से खिलाड़ी का मूल्यांकन किया जाता है| देखने वाली बात यह है कि इस आयोजन मे कई लाख मे से मात्र सौ खिलाड़ियों को स्थान मिल पाता है|जहाँ तक संतोष ट्राफ़ी की बात है तो इसे लेकर हर तरफ असंतोष का माहौल बना हुआ है|

      आजकल संतोष ट्राफ़ी के क्षेत्रीय मुक़ाबले खेले जा रहे हैं जिनका कोई महत्व नहीं रह गया है| अखिल भारतीय फुटबॉल फेडरेशन की सनक के अनुसार प्रत्येक राज्य की टीम मे पाँच खिलाड़ी 21 साल तक के होने चाहिए,जिनमे से सिर्फ़ तींन एक समय पर मैदान पर उतर सकते हैं|बाकी खिलाड़ियों के लिए कोई आयु सीमा नहीं है|लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि राष्ट्रीय चैंपियनशिप को सिर्फ़ 20-21 साल तक के खिलाड़ियों का आयोजन घोषित किए जाने मे क्या बुराई है? ऐसा करने मे छोटी उम्र के खिलाड़ी मिल जाएँगे और उन्हें पढ़ाना  सिखाना  भी आसान रहेगा| जब राष्ट्रीय आयोजन को कोई भाव नहीं दिया जा रहा तो उसे प्रतिभा खोज कार्यक्र्म के रूप मे विकसित किया जा सकता है| ज़रूरत इस बात की है कि फेडरेशन राष्ट्रीय चैंपियनशिप को महत्व दे,प्रतिभा खोज के लिए अपने अधिकारियों को भेजे और श्रेष्ठ का चयन कर राष्ट्रीय टीम मे शामिल करे| वरना ऐसे आयोजन का कोई मतलब नहीं रह जाता|

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