मिट्टी की कुश्ती ओलंपिक में!

राजेंद्र सजवान,
भले ही कुश्ती ने गद्दे को पूरी तरह अपना लिया है और ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, एशियाड और कामनवेल्थ खेलों मे भारतीय पहलवान बड़ी छाप छोड़ने मे कामयाब हो रहे हैं लेकिन आज भी एक बड़ा तबका ऐसा है जिसे मिट्टी की कुश्ती से प्यार है और उसके लिए मिट्टी से बाहर निकलना संभव नहीं हो पा रहा| सिर्फ़ भारत में ही नहीं एशिया,अफ्रीका और लेटिन अमेरिका के बहुत से देशों मे मिट्टी की कुश्ती का चलन बदश्तूर जारी है| मिट्टी की कुश्ती मे लोट पोट होने वाले देश और पहलवान अब अंतरराष्ट्रीय कुश्ती महासंघ से माँग कर रहे हैं कि ओलंपिक मे मिट्टी की कुश्ती को पारंपरिक खेल के रूप मे शामिल किया जाए|भारतीय कुश्ती से जुड़े कई गुरु खलीफा और जाने माने पहलवान ऐसे प्रयोग के पक्ष मे हैं|

उनकी राय में भारत और उसके जैसे ग़रीब देशों मे आधुनिक कुश्ती की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं| नतीजन ज़्यादातर पहलवानों का बचपन मिट्टी के अखाड़े मे व्यतीत होता है| अर्थात उनकी बुनियाद मिट्टी से मजबूत होती है और बाद मे चलकर गद्दे पर उतरते हैं| ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त ने भी ज़्यादा समय मिट्टी के अखाड़ों मे ज़ोर किया| उनसे पहले मास्टर चंदगी राम, करतार, प्रेमनाथ, सतपाल, सुदेश कुमार, सुभाष आदि पहलवान मिट्टी मे पले बढ़े| इनमे से लगभग सभी चाहते हैं कि मिट्टी की कुश्ती को जारी रखना कुश्ती के हित मे है|द्रोणाचार्य राज सिंह की राय मे यदि मिट्टी की कुश्ती को ओलंपिक मे जगह मिल सकती है तो सबसे बड़ा फ़ायदा भारत जैसे देशों को होगा| कुछ इसी प्रकार की सोच द्रोणाचार्य रामफल,द्रोणाचार्य महा सिंह, अर्जुन अवॉर्डी राजीव तोमर,अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित अशोक कुमार,रोहताश दहिया, गुरुबद्रि अखाड़े के संचालक राकेश लल्ला और गुरु मुन्नी अखाड़े के संचालक भाई महावीर तथा द्रोणाचार्य रोशन लाल भी रखते हैं| मिट्टी की कुश्ती की फेडरेशन के महासचिव रोशन लाल और उनके अध्यक्ष राम आसरे विश्व स्तर पर अपनी शैली को जिंदा रखने के लिए दृढ़ संकल्प हैं| उनका कहना है कि मिट्टी की कुश्ती मंगोलिया, जापान, कोरिया, चीन, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, लेटिन अमेरिका आदि देशों मे अपने-अपने स्टाइल मे फल फूल रही है| समय सीमा और नियमों मे बाँध कर इस शैली को और अधिक रोमांचक बनाया जा सकता है| ऐसे मे शुरुआत मे पहले दो-तीन भार वर्गों से ओलंपिक मे प्रयोग शुरू किया जा सकता है| ठीक वैसे ही जैसे महिला कुश्ती और मुक्केबाज़ी के मुक़ाबले शुरू किए गये थे| राज सिंह और रोशन लाल मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को प्रस्ताव भेजा जा सकता है| ऐसा सभी देशों के प्रयासों से संभव हो पाएगा| वैसे भी आईओसी अधिकाधिक नये खेलों को शामिल करने मे ज़ोर दे रही है|

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