लाजवाब थी कलमाड़ी -भनोट की जोड़ी !

राजेंद्र सजवान
बेशक, एथलेटिक तमाम खेलों की जननी है लेकिन इस खेल मे भारतीय खिलाड़ी विश्व और ओलंपिक स्तर पर बड़ी छाप नहीं छोड़ पाए हैं|भले ही भारतीय खिलाड़ियों ने कुश्ती, मुक्केबाज़ी, निशानेबाजी, टेनिस, बैडमिंटन, वेटलिफ्टिंग, हॉकी जैसे खेलों मे ओलंपिक पदक जीते परन्तु एक एथलेटिक ओलंपिक पदक की पिछले सौ सालों से प्रतीक्षा है| कामनवेल्थ खेलों और एशियाड मे भारतीय एथलीटों ने लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है और पदक भी जीते हैं पर ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन मे भारत की झोली खाली है|

ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय एथलेटिक महासंघ वक्त के अनुसार बदलाव करने मे पूरी तरफ सफल नहीं हो पाया है| कुछ साल पहले जब सुरेश कलमाडी एथलेटिक फेडरेशन के अध्यक्ष और ललित भनोट सचिव थे ,तब भारतीय एथलीट बड़ी ताक़त के रूप मे उभर रहे थे और ऐसा माना जा रहा था कि भारत के लिए ओलंपिक पदक ज़्यादा दूर नहीं है| पाँच दशक पहले मिल्खा सिंह और उनके बाद पीटी उषा ने भारतीय एथलेटिक को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई| दोनों ही महान एथलीट ओलंपिक पदक के एकदम करीब पहुँच कर चूक गये|

उषा तो सेकेंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक गँवा बैठीं| आगे भी कुछ थ्रो और लंबी एवम् त्रिकूद स्पर्धाओं मे पदक आते आते रह गया| अंजू बाबी जार्ज, शाइनी विल्सन और कुछ और महिला एथलीटों ने अनेक अवसरों पर शानदार प्रदर्शन किया परंतु ओलंपिक पदक नहीं जीत सके| देश के जाने माने एथलीटों, एक्सपर्ट्स और अन्य से पूछें तो ज़्यादातर की राय मे जबसे सुरेश कलमाडी और ललित भनौट की जोड़ी ने एथलेटिक फेडरेशन से नाता तोड़ा है, भारतीय एथलीटों के प्रदर्शन मे गिरावट आई है|

जानकारों की राय मे दोनों की जोड़ी को ना सिर्फ़ भारतीय खिलाड़ियों के बारे मे गहरी समझ थी अपितु अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक महासंघ मे भी उनका उँचा रसूक था| उनके हटने के बाद से ना तो भारतीय फेडरेशन मे दम नज़र आता है और ना ही फेडरेशन के पास कोई ठोस रणनीति है| फिलहाल नीरज चोपड़ा, हिमादास और दुतिचन्द ने उम्मीद जगाई है| देखते हैं टोक्यो ओलंपिक मे भारत इस खेल मे पदकों के सूखे से उबर पाएगा!

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