बदहाल बैडमिंटन!

राजेंद्र सजवान
पिछले एक माह मे भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों ने जैसा प्रदर्शन किया है उसे देख कर ना सिर्फ़ खेल जानकार हैरान परेशान हैं अपितु भारतीय बैडमिंटन के कर्ता धर्ता, कोच, बीएआई, और खुद खिलाड़ी भी सकते मे हैं| आख़िर ऐसा क्या हो गया कि कल तक जिन खिलाड़ियों की तूती बोलती थी, उन्हें प्रतिष्ठा बचाने के लाले पड़ गये हैं| मलेशियन ओपन, इंडियन ओपन और सिंगापुर ओपन के नाकाम प्रदर्शन के बाद कुछ एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि चीफ़ कोच गोपी की जादुई छड़ी कुन्द पड़ गई है| ओलंपिक पदक जीतने के बड़े बड़े दावे करने वालों की बोलती भी बंद है|

टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा गठित टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम मे शामिल 23 टाप खिलाड़ियों मे से आठ बैडमिंटन से हैं, जिनमे ओलंपिक पदक विजेता सायना नेहवाल, पीवी सिंधु, किदाम्बी श्रीकांत, प्रोनोय,समीर वर्मा, सत्विक साइ राज जैसे बड़े नाम शामिल हैं| अर्थात खेल मंत्रालय और साई मानते हैं कि बैडमिंटन ऐसा पहला खेल है जिसमे ओलंपिक पदक की उम्मीद सबसे ज़्यादा है| यही कारण है कि खेल मंत्रालय द्वारा दी जा रही 35 करोड़ की स्पेशल ग्रांट मे से बड़ा हिस्सा बैडमिंटन खिलाड़ियों पर खर्च किया जा रहा है| ऐसा स्वाभाविक भी है, क्योंकि घर घर मे खेले जाने वाले इस चिड़ी-छक्के के खेल ने देश को ओलंपिक और विश्व स्तर पर अलग पहचान दिलाई है| प्रकाश पादुकोन, दिनेश खन्ना, सैयद मोदी, विमल कुमार, गोपी चन्द से होता हुआ यह खेल जब सायना नेहवाल और पीवी सिंधु जैसे सुरक्षिण हाथों मे पहुँचा तो भारतीय बैडमिंटन की चिड़िया की चहचहाट पूरी दुनिया मे सुनी गई| जिस खेल मे चीन,मलेशिया, इंडोनेशिया, कोरिया, जापान,इंग्लैंड,डेनमार्क,स्पेन, चीनी ताईपे आदि देशों के खिलाड़ी बेहतर माने जाते थे उसमे भारतीय खिलाड़ियों ने पिछले दस सालों मे गजब का पराक्र्म दिखाया और कई बड़े आयोजनों मे मजबूत छाप छोड़ी|

साल भर पहले तक यह माना जाने लगा था कि वर्षों तक इस खेल मे बादशाहत कायम करने वाले चीनी खिलाड़ियों को यदि कोई पीछे धकेल सकता है तो वह निसंदेह भारतीय खिलाड़ी हो सकते हैं| इस कामयाबी का बड़ा श्रेय द्रोणाचार्य और तमाम अवार्डों से सम्मानित कोच गोपीचन्द को दिया गया| नतीजन खेल का तमाम तामझाम गोपी और उनकी अकादमी के इर्द गिर्द घूमने लगा| गोपी ने जिसे चाहा अपने बेड़े मे शामिल किया और मनपसंद के कोच अपनी टीम मे लिए| उसने विदेशी कोच माँगे तो उनका इंतज़ाम भी कर दिया गया|लेकिन यकायक भारतीय बैडमिंटन का ग्राफ क्यों गिरने लगा है? जो खिलाड़ी कभी खिताब या उसके करीब पहुँच कर ही दम लेते थे उनका दमखम पहले दूसरे राउंड मे जवाब देने लगा है|

लगातार तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट मे भारतीयों की नाकामी ने खेल पर किसी बड़े संकट की तरफ इशारा किया है| क्या बीएआई अपना काम सही अंजाम नहीं दे रहा? क्या गोपी पर अत्यधिक भरोसा असंतुष्टों को खल रहा है? या भारतीय बैडमिंटन के बुरे दिन शुरू हो गये हैं, जैसे सवाल हर किसी की ज़ुबान पर हैं|

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