टीवी चैनलोंकी अज्ञानता, भारतीय क्रिकेट का मखौल उड़ा!

राजेंद्र सजवान
इसमे दो राय नहीं कि भारत मे क्रिकेट को जुनून की हद तक पसंद किया जाता है और यह खेल एक धर्म का रूप लेता जा रहा है| लेकिन जब कोई खेल धार्मिक उन्माद की हदें पार कर जाता है तो उसे पता नहीं क्या कहा जाना चाहिए ? महेंद्र सिंह धोनी के “बलिदान बैज” के कारण जैसा हंगामा मचा उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है क्रिकेट आम भारतीय के दिल दिमाग़ और उसकी धार्मिक सामाजिक मान्यताओं को भी प्रभावित करने लगा है|

धर्मांधता मे पड़ कर आम और खास क्रिकेट प्रेमी यह भी भूल जाता है कि क्रिकेट बाकी खेलों की तरह ही सिर्फ़ एक खेल है और उसे सिर्फ़ खेल की तरह ही लिया जाना चाहिए| लेकिन ऐसा हो नहीं रहा| धोनी के ग्लब्स पर कृपाण वाले चिन्ह को लेकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आईसीसी) का हठी रवैया आम भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को रास नहीं आया| पूरा देश धोनी के पक्ष मे लामबंद हो गया|

जमकर बवाल काटा गया| धोनी के पक्ष मे जमकर नारेबाज़ी हुई| लेकिन अंततः खुद धोनी को जिद्द छोड़नी पड़ी| ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आईसीसी ने ना तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड की सुनी और ना ही भारतीय भावनाओं की परवाह की| तो फिर हंगामे से क्या निकला? धोनी को भी इसलिए झुकना पड़ा क्योंकि उनका विश्व कप से बाहर होना तय था और हो सकता है कि भारतीय भागीदारी भी ख़तरे मे पड़ जाती| लेकिन सारे फ़साद की जड़ में भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया रहा है| अपनी टीआरपी के लिए हमारे टीवी चैनल किसी भी हद तक जा सकते हैं और यह उन्होने धोनी के मामले मे साबित कर दिखाया|

सही मायने में यह मामला बातचीत से हल हो सकता था पर चैनलों पर बैठे तथाकथित एक्सपर्ट, इन चैनलों के मुँह लगे सेना के पूर्व अफसरों और राजनीति के कुछ मौक़ापरस्त खिलाड़ियों ने ऐसा रायता फैलाया कि पूरे देश को लगा जैसे भारत और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्था के बीच कोई जंग चल रही है| ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि क्रिकेट के नियमों से अंजान चैनलों ने पूरे देश को गुमराह किया और क्रिकेट के पागलपन मे डूबे क्रिकेट प्रेमी भी धर्मांधता मे बहते चले गये|

जाहिर है ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि भारतीय क्रिकेट प्रेमियों मे से ज़्यादातर क्रिकेट को गंभीरता से नहीं लेते या उनमे ज़्यादातर ऐसे हैं जोकि क्रिकेट मैच हारने को देश हारने के रूप मे देखते हैं| इस प्रकार की मानसिकता क्रिकेट और किसी भी खेल के हित मे नहीं है और शायद देश हित मे भी नहीं हो सकती| हैरानी वाली बात यह है कि जब आईसीसी के आगे किसी की नहीं चली तो धोनी चुपचाप मान गये और बेकार की धौंस देने वाले चैनलों और उन पर डेरा जमाए बैठे अवसरवादियों ने भी चुप्पी साध ली|

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