हॉकी का पतन: स्टार खिलाड़ी पैदा करने वाला कारखाना ठप्प!

राजेंद्र सजवान
भारतीय हॉकी प्रेमी, एक्सपर्ट्स और हॉकी से जुड़े तमाम जानकार इस बात को लेकर हैरान हैं कि तमाम सुविधाओं के बावजूद भी भारतीय हॉकी मे सुधार क्यों नहीं हो पा रहा? क्यों हमारे खिलाड़ी जापान और मलेशिया जैसे देशों से हार जाते हैं या ओलंपिक मे सम्मानजनक स्थान अर्जित नहीं कर पा रहे| कुछ पूर्व खिलाड़ियों और ओलंपिक पदक विजेताओं की मानें तो जब से भारतीय हॉकी ने स्टार खिलाड़ी पैदा करने बंद किए हैं या जब से भारत मे मैच विजेता खिलाड़ियों का अकाल पड़ा है तब से बड़े खिताबों से भी दूर होते जा रहे हैं|

यह सही है कि भारत ने ज़्यादातर सफलताएँ घास के मैदानों पर अर्जित की हैं लेकिन आज भारतीय हॉकी की नाकामी के साथ ऐसे बहाने जोड़ना तर्क संगत नहीं लगता| कुछ समय पहले बलबीर सिंह सीनियर, अजीत पाल,अशोक ध्यानचन्द, असलम शेर ख़ान, ज़फर इकबाल आदि खिलाड़ियों से बातचीत से यह निष्कर्ष निकला कि भारतीय हॉकी से अब स्टार खिलाड़ी लुप्त होते जा रहे हैं| जानकारों के अनुसार धनराज पिल्ले भारतीय हॉकी के आख़िरी स्टार खिलाड़ी थे| हालाँकि धनराज के बाद भी कई अच्छे खिलाड़ी सामने आए लेकिन उनमे चैम्पियनों वाले गुण कम ही देखने को मिले|

आज़ादी से पहले मेजर ध्यान चन्द के साथ उनके भाई रूप सिंह और कई अन्य खिलाड़ी भारतीय हॉकी को तीन ओलंपिक स्वर्ण दिलाने मे कामयाब रहे तो आज़ादी बाद के सबसे बड़े खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर रहे| केडी बाबू, पिंटो, जेंटल, केशव दत्त, क्लाडियस, उधम सिंह, शंकर लक्ष्मण, बालकिशन, भोला आदि खिलाड़ियों ने तीन ओलंपिक स्वर्ण जीतने मे अहम भूमिका निभाई|

सभी एक से बढ़कर एक थे| यह सिलसिला 1975 के विश्व कप तक चलता रहा| पहला और एकमात्र विश्व खिताब जीतने वाली टीम मे कप्तान अजीत पाल के अलावा सुरजीत सिंह, अशोक ध्यान चन्द, असलम शेर ख़ान, बलदेव, फिलिप्स, गोविंदा और तमाम खिलाड़ी स्टार कहलाने लायक थे| साल भर बाद जब यही खिलाड़ी मांट्रियल ओलंपिक मे उतरे तो उनके अंदर का चैम्पियन कहीं खो गया लगता था| हालाँकि आठ साल बाद टोक्यो ओलंपिक मे भारत ने अपना सातवाँ स्वर्ण पदक जीता और वापसी का संकेत दिया|

विजेता टीम मे चरणजीत सिंह, हरीपाल कौशिक, पृथ्वी पाल, लक्ष्मण, हरविंदर, उधम सिंह, गुरबॅक्स, धरम सिंह जैसे नामी खिलाड़ी शामिल थे| 1980 के अमेरिकी बायकाट वाले मास्को ओलंपिक मे ज़फ़र इकबाल और शाहिद स्टार खिलाड़ी बनकर उभरे| एक बड़े खिलाड़ी के रूप मे धनराज पिल्ले खूब खेले| 1998 के एशियाड मे भारत को स्वर्ण पदक दिलाने मे धनराज का बड़ा हाथ रहा|

उनके समकालीन खिलाड़ियों मे परगट सिंह, सोमैया, जगबीर, मुकेश कुमार और बाद के खिलाड़ियों मे दिलीप टिर्की, संदीप सिंह, सरदार सिंह, श्रीजेश आदि ने नाम कमाया पर अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमक नहीं बिखेर पाए|

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