चूँकि गुलामों को बग़ावत का हक नहीं …

राजेंद्र सजवान
चूँकि कामनवेल्थ खेल महासंघ ने 2022 के बर्मिंघम कामनवेल्थ खेलों मे शूटिंग को शामिल नहीं किया है, इसलिए भारत को इन खेलों का बायकाट करना चाहिए| भारतीय शूटिंग महासंघ(एनआरएआई) ने भारतीय ओलंपिक संघ और खेल मंत्रालय से इस प्रकार का आग्रह किया है| बेशक, कामनवेल्थ खेलों की पितृ संस्था का यह फ़ैसला हैरान करने वाला है|

हालाँकि इस बारे मे निर्णय काफ़ी पहले ले लिया गया था और सभी सदस्य इकाइयों को अवगत भी कर दिया गया था| अब अंतत: फ़ैसला सुना दिया गया था और तमाम देशों की माँग को अनसुना कर शूटिंग को खेलों से बाहर कर दिया गया है| इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि कब शूटिंग की फिर से वापसी होगी| इस फ़ैसले को लेकर बहुत कम देशों ने खुल कर नाराज़गी व्यक्त की है लेकिन चूँकि भारत को बहुत ज़्यादा पदकों का नुकसान सहना पड़ेगा इसलिए भारतीय अधिकारी, खिलाड़ी और खेल प्रेमी ख़ासे नाराज़ हैं|

शूटिंग ही एकमात्र ऐसा खेल है जिसमे भारत ने व्यक्तिगत खेलों का स्वर्ण पदक जीता है| 2018 के गोल्ड कोस्ट खेलों मे भारतीय निशानेबाजों ने कुल 64 पदकों मे से 16 पदक अर्जित किए थे और पदक तालिका मे भारत को सम्मान जनक स्थान मिला था| पहले भी भारतीय खिलाड़ी इन खेलों मे रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन करते आए हैं| ज़ाहिर है भारत को बड़ा नुकसान होगा| लेकिन खेलों के बायकाट का निर्णय लेना आसान नहीं है| कारण कामनवेल्थ खेल महासंघ और ब्रिटेन के विरुद्ध शायद ही कोई आवाज़ उठाए चूँकि कामनवेल्थ खेलों को गुलामों का खेल माना जाता है|

इन खेलों मे भाग लेने वाले देश वे हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम थे| कुल मिलाकर निशानेबाज़ी बाहर होगी और शायद ही इस मुद्दे पर कोई अन्य देश भारत का साथ दे पाएगा| वैसे भी कामनवेल्थ से बड़ा कोई मंच नहीं है जहाँ कोई सुनवाई हो सके| खेल मंत्री पहले ही अपना पक्ष स्पष्ट कर चुके हैं| उन्होने बॉल सरकार के कोर्ट मे डाल दी है और सरकार की भी मजबूरी है|

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