टाइगर की खाल मे मेमने 

राजेंद्र सजवान

इंटर कॉंटिनेंटल कप मे पिछले साल जब भारतीय कप्तान और श्रेष्ठ खिलाड़ी सुनील छेत्री ने देश के फुटबॉल प्रेमियों से हाथ जोड़ कर आग्र्ह किया कि प्रोत्साहन देने के लिए स्टेडियम में आएँ तोहज़ारों- लाखों ने उनकी भावना को समझा और ना सिर्फ़ फुटबॉल के चाहने वाले अपितु अन्य खेलों से जुड़े लोग भी उनके अभियान में शामिल हुए जिनमे क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली भी एक थे| लेकिन इस बार चार देशों में चौथे स्थान पर रहना और तीन मैचों में दस गोल खाना भारतीय फुटबॉल की प्रगति के दावे की पोल खोलने के लिए काफ़ी है|

उतर कोरिया, ताजिकिस्तान और सीरिया जैसी टीमों के विरुद्ध यह प्रदर्शन बताता है कि हमारी फुटबॉल सही दिशा में नहीं बढ़ रही है| तो फिर कोई फुटबॉल देखने क्यों जाए! दो मैच हारे और सीरिया से ड्रा खेला| नये कोच इगोर स्टीमेक को दोष देने का भी कोई फ़ायदा नहीं क्योंकि उसके पास बहाना तैयार है कि अभी तो कमान संभाली है| लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि वर्षों से विदेशी कोच सिखाते पढ़ाते आ रहे हैं पर कोई भी भारतीय फुटबॉल की दुखती रग नहीं पकड़ पाया| कोई भी नहीं समझ पाया कि बीमारी क्या है और इलाज कौन कर सकता है|

ताजिकिस्तान और कोरिया ने भारतीय खिलाड़ियों को पूरी तरह एक्सपोज़ किया और बच्चों की तरह खिला खिला कर हराया| सीरिया से इसलिए बच गये क्योंकि रेफ़री ने मेजबान के दबाव में ग़लत फ़ैसले दिए|पूरे मैच में सीरियाई खिलाड़ी हावी रहे, बस गोल ही नहीं निकल पाया| यह हाल तब हुआ जबकि आयोजन अपना था और अपने दर्शक बड़ी संख्या में खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने आए थे लेकिन बड़ा बुरा अनुभव लेकर गये| ऐसे में जब टीवी पर बड़बोले कमेंटेटर बार बार ‘ब्लू टाइगर’ का संबोधन करते हैं तो बेचारे टाइगर पर भी तरस आता है| सच्चाई यह है कि कोरिया और ताजिकिस्तान ने अपने युवा और जूनियर खिलाड़ियों को मुक़ाबले में उतारा जबकि मेजबान भारत अपनी पूरी ताक़त के साथ उतरा और चारों खाने चित हुआ|

यह हाल तब है जबकि भारतीय फुटबॉल फ़ीफ़ा रैंकिंग में 101 नंबर पर है और ताजिकिस्तान और कोरिया क्रमशः 120 और 122 वें नंबर पर हैं| फिर भी शर्मनाक हार! यह बात अलग है कि कुछ खिलाड़ी फिट नहीं थे या अपनी ख्याति के अनुरूप नहीं खेल पाए| हमेशा की तरह सुनील छेत्री और गोलकीपर सिद्धू पर सारा दारोमदार रहा और दोनों ने अपना काम बखूबी अंजाम दिया| यदि लाखों करोड़ों बहाने के बाद भी भारतीय फुटबॉल को इसी प्रकार देश का नाम और देशवासियों का पैसा बर्बाद करना है तो बेहतर होगा कि फुटबॉल को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए| फिलहाल टाइगर जैसा संबोधन भी रोक दिया जाना चाहिए|

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