डोप का चाबुक क्रिकेट के लिए घातक 

राजेंद्र सजवान

वो भी दिन थे जब भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) खुद को भारत सरकार और खेल मंत्रालय से बड़ी संस्था मानता था और टीम इंडिया की बजाय टीम बीसीसीआई कहलाने मे गर्व महसूस करता था| ऐसे भी मौके आए जब क्रिकेट खिलाड़ियों ने कामनवेल्थ खेलों में भाग लेने की बजाय टोरंटो में खेलने को तरजीह दी और एशियाड को गंभीरता से नहीं लिया|

इसलिए चूँकि देश और पदक के लिए खेलने पर लाखों करोड़ों नहीं मिलते, जबकि विदेशों में खेलने पर लाखों मिलते रहे हैं| लेकिन सरकारों की पता नहीं क्या मजबूरी थी कि क्रिकेट खिलाड़ियों को विशिष्ट व्यक्ति और बड़ी हस्ती माना गया| उन्हें खेल रत्न, अर्जुन अवॉर्ड और कोचों को द्रोणाचार्य अवॉर्ड बाँटे गए| और तो और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न बना दिया गया| एक ऐसा सम्मान जिसके लिए हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचन्द को हकदार नहीं माना गया,उनके प्रशंसक वर्षों से माँग कर रहे हैं पर एक नहीं सुनी गई| लेकिन मनमोहन सरकार ने सचिन का महिमामंडल सातवें आसमान तक पहुँचा दिया|

अब वही क्रिकेट बिलबिलाती फिर रही है| नाडा के चाबुक ने उसको हैसियत का आईना देखने के लिए मजबूर कर दिया है| आम भारतीय के नज़रिए से कहें तो भला हो पृथ्वी शॉ का जिसका डोप पॉजिटिव होना नये बदलाव के लिए प्रेरणा बना है| भले ही बोर्ड और खिलाड़ी उसे कोस रहे होंगे परंतु सरकार, खेल मंत्रालय, नाडा और देश में खेलों को प्रोत्साहन और सही दिशा देने वाली इकाइयों के लिए क्रिकेट की अक्ल ठिकाने लगाने का सही मौका है|

क्रिकेट खिलाड़ी, अधिकारी और बोर्ड ने हमेशा ही खुद को खुदा माना और बाकी खेलों को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी| एक ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ी किसी अदना से क्रिकेटर के सामने खुद को असहज पाता रहा, क्योंकि क्रिकेट खाने-चाटने वाले और क्रिकेट की हवा में साँस लेने वाले इस देश ने क्रिकेटरों को भगवान बना डाला था|

जिस व्यवस्था में हमारे नेता-सांसद अपना जुगाड़ खोजते फिरते थे, उस पर सरकार और राष्ट्रीय डोपिंग निरोधी एजेंसी (नाडा) ने नकेल डालने की पूरी तैयारी कर ली है| अर्थात अब क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल महासंघ (एनएसएफ) बनाए जाने की पहल हो चुकी है और यदि ऐसा होता है तो क्रिकेट को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के अंतर्गत आना ही पड़ेगा| सीधा सा मतलब है कि राष्ट्रीय खेल संघ बन जाने पर क्रिकेट को सरकार, आईओए और अंतरराष्ट्रीय खेल नियमों के अनुरूप चलना पड़ेगा|

उस पर से स्वायत संस्था का गीदड़ पट्टा हट जाएगा| जिस प्रकार देश के चैम्पियन एथलीटों, पहलवानों,मुक्केबाज़ों और तमाम खिलाड़ियों को डोप टेस्ट के लिए बाध्य किया जाता है उसी प्रकार नाडा-वाडा विराट कोहली रोहित शर्मा या किसी भी बड़े छोटे क्रिकेटर को डोप सैंपल देने के लिए कह सकते हैं| बेशक, क्रिकेट और अन्य खेलों के बीच का अंतर मिट जाएगा| ऐसा होने से क्रिकेट की अकड़ भी ढीली पड़ जाएगी|

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