खेल अवॉर्ड कमेटी से खिलवाड़!

राजेंद्र सजवान
राष्ट्रीय खेल अवार्डों के लिए गठित कमेटियाँ हमेशा से विवाद के घेरे में रही हैं और अक्सर खेल अवार्डों की बंदरबाँट के बाद कमेटियों की आलोचना होती आई है| लेकिन ऐसा पहली बार है,जब 12 सदस्यीय टीम को लेकर अभी से सुगबुगाहट शुरू हो गई है| यह पहली बार हो रहा है जब एक ही कमेटी तमाम खेल अवार्डों- राजीव गाँधी खेल रत्न, द्रोणाचार्य अवार्ड, अर्जुन अवार्ड और ध्यानचन्द अवॉर्ड का फ़ैसला करेगी|

एक सेवानिवृत जज, खेल मंत्रालय और खेल प्राधिकरण के अधिकारियों के साथ जिन नामों को कमेटी में स्थान दिया गया है उनमे सबसे ज़्यादा हैरानी मुक्केबाज़ी की विश्व चैम्पियन और ओलंपिक पदक विजेता मैरीकाम के नाम पर व्यक्त की जा रही है| ट्रायल नहीं देने को लेकर चर्चा में आई यह मुक्केबाज़ अभी रिंग में है और ओलंपिक के लिए कमर कसे है| इतना ही नहीं उसके अपने कोच छोटे लाल यादव ने भी द्रोणाचार्य अवॉर्ड के लिए आवेदन किया है|

जाहिर है सीधे सीधे हितों के टकराव का मामला बनता है| भारतीय खेलों पर सरसरी नज़र डालें तो हमें ओलंपिक पदक हॉकी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, निशाने बाजी, बैडमिंटन, वेटलिफ्टिंग और टेनिस में मिले हैं| दुर्भाग्यवश इन खेलों की बात मजबूती से रखने वाला एक भी अधिकारी या खिलाड़ी अवार्ड कमेटी में शामिल नहीं है| ऐसे में देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी पहलवान बजरंग पूनिया को खेल रत्न मिलने के मौके कमतर नज़र आ रहे हैं|

चूँकि पूर्व टेबल टेनिस खिलाड़ी कमलेश मेहता टीम में हैं इसलिए मणिका बत्रा का दावा भारी पड़ सकता है| कमलेश मेहता को अवार्ड कमेटी में लगातार दूसरे साल शामिल करने पर भी हैरानी व्यक्त की जा रही है| नियमों के अनुसार दो साल का का गैप होना चाहिए| एक अँग्रेज़ी दैनिक के चीफ़ और एक कमेंटेटर को कमेटी का हिस्सा बनाए जाने को लेकर दावेदार खिलाड़ियों में बेचैनी का माहौल है| अंजुम चोपड़ा और बाई चुंग भूटिया के खेलों की हैसियत किसी से छिपी नहीं है|

ओलंपिक और एशियाड में पदक जीतने वाले खेलों की अनदेखी कर फुटबॉल और महिला क्रिकेट के बड़े नामों को शामिल करने को शक की नज़र से देखा जा रहा है| कई पूर्व अवार्ड विजेता खिलाड़ियों और कोाचों को डर है कि कुश्ती, हॉकी, निशानेबाज़ी और बैडमिंटन के चैम्पियनों के साथ नाइंसाफी हो सकती है, क्योंकि उनकी बात रखने वाला कोई नहीं होगा| यदि ऐसा हुआ तो हमेशा की तरह खेल अवार्ड उपहास के पात्र बन सकते हैं और कुछ एक खिलाड़ी विरोधस्वरूप कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं| फिर तो यही कहेंगे कि खेल अवार्डों की बंदरबाँट जारी है|

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