जो अमर हो गए, उनको सम्मान क्यों नहीं?

राजेन्द्र सजवान

कुश्ती भारत के सबसे प्राचीन खेलों में से है। इस खेल का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है उस हिसाब से कुश्ती को सम्मान देने में शायद हम से कहीं ना कहीं कोई बड़ी चूक हुई है या कंजूसी की गई है। वरना क्यों बार बार स्वर्गीय मास्टर चन्दगी राम, गुरु राम धन, खलीफा बद्री और खलीफा जसराम को द्रोणाचार्य अवार्ड दिए जाने की मांग की जाती रही है। संयोग से यह सभी गुरुओं के गुरु स्वर्गीय गुरु हनुमान के समकालीन थे और उनके शिष्यों में भी अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता रहे।

इन सभी ने उस वक्त भारतीय कुश्ती को आगे बढाने में योगदान दिया जब दिल्ली कुश्ती का हब थी और तमाम अखाड़े देश को विजेता पहलवान देने में सक्षम थे। बेशक, गुरु हनुमान के अखाड़े ने सुदेश, प्रेमनाथ, करतार, सतपाल और दर्जनों पहलवान निकाले लेकिन दो सौ कदम दूर बद्री खलीफा का अखाड़ा भी कम चर्चित नहीं था। लेकिन बतौर एक पहलवान और फिर कोच की हैसियत से चंदगीराम सर्वश्रेष्ठ आंके जा सकते हैं।

लंबी ऊंची कद काठी और अति सुंदर चेहरे मोहरे वाले इस पहलवान का डंका पूरी दुनिया में बजा। 1970 के तेहरान एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर राष्ट्रीय हीरो बने और अर्जुन एवम पदम श्री जैसे सम्मान पाए। हिन्द केसरी, भारत केसरी,महान भारत केसरी और जाने कितने सम्मान उनके साथ जुड़े। उनके बारे में प्रचलित है कि जिसकी कलाई पकड़ लेते थे, छुड़ा नही पाता था।

कोच के रूप में भी उन्होंने खूब नाम कमाया। जगरूप, सत्यवान, कृपा शंकर, सुपुत्र जगदीश कालीरमन, दो बेटियां और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय पहलवान उनके अखाड़े की देन रहे। भारत में महिला कुश्ती के जन्मदाता और प्रणेता भी वही थे। लाख विरोध के बावजूद उन्होंने महिला कुश्ती को अपने घर से शुरू कर बुलंदियों तक पहुंचाया। यदि उन्हें मरणोपरांत द्रोणाचार्य अवार्ड देने की मांग की जाती है तो उनके शिष्यों और चाहनेवालों की भावनाओं को समझने की जरूरत है। जहां तक खलीफा राम धन की बात है तो वह गुरु हनुमान अखाड़े के असली कोच थे।

गुरु हनुमान जब वृद्ध हो गए तो वह लाठी और कड़क आवाज से अखाड़े का संचालन करते और दाव पेंच सिखाने का काम रामधन करते थे।उनके योगदान को याद करने वाले यदि द्रोणाचार्य अवार्ड देने की मांग करते हैं तो कुछ भी गलत नहीं है। खलीफा जसराम ने भी अपना सारा जीवन कुश्ती को दिया और कई ओलंपियन और अंतरराष्ट्रीय पहलवान देश को दिए।अफसोस कि बात यह है कि जहां एक ओर कई जुगाड़ू द्रोणाचार्य बन गए तो दूसरी तरफ अपना सारा जीवन मिट्टी में लोटपोट होने वाले और उसी मिट्टी में मिल चुके कई नाम आज भी अपने सम्मान के लिए भटक रहे हैं।कमसे कम मास्टर चन्दगी राम को तो सम्मान दिया जा सकता है। फिर चाहे कितने भी नियम कानून क्यों तोड़ने पड़ जाएं।

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.