मंत्रालय और नाडा का किया धरा

राजेंद्र सजवान

इसमें कोई शक नहीं कि भारत भले हू दुनिया के फिसड्डी खेल राष्ट्रों में है किंतु नशाखोरी की मदद से पदक जीतने की लालसा और डोप टेस्ट में पकड़े जाने के मामले भारतीय खिलाड़ियों पर लगातार देखने में आए हैं| एक सर्वे से पता चला है कि तमाम भारतीय खेल प्रतिबंधित दवाएँ लेकर प्रदर्शन में सुधार की कोशिशों में लिप्त हैं और राष्ट्रीय एवम् अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में हमारे खिलाड़ी देश का नाम बदनाम करते आ रहे हैं|

हाल ही में छह माह के लिए प्रतिबंधित राष्ट्रीय डोप टेस्ट लेबोरेटरी(एनडीपीएल) की क़ाबलियत और निष्ठा पर सवालिया निशान लगाया जाना बताता है कि भारत खेलों में पिछड़ा होने के साथ साथ तकनीकी रूप से भी बेहद पीछे चल रहा है| विश्व डोपिंग निरोधक एजेंसी(वाडा) ने भारतीय डोप निरोधक एजेंसी(नाडा) को पहले भी आगाह किया था लेकिन खेल मंत्रालय और नाडा ने अंतराष्ट्रीय इकाई की बात को गंभीरता से नहीं लिया| सन 2008 में जब भारतीय डोप एजेंसी को वाडा ने मान्यता दी थी तो उम्मीद की जा रही थी कि अब बिगड़ैल भारतीय खिलाड़ियों की खैर नहीं रह जाएगी|

लेकिन कुछ सालों में ही नाडा पर उंगलियाँ उठने लगी थीं| कामनवेल्थ खेलों के चलते काफ़ी कुछ ठीक तक चलता रहा लेकिन जब एक साल बाद ही नाडा द्वारा क्लीन चिट पाने वाले खिलाड़ी वाडा द्वारा धर दबोचे गये तो साफ हो गया कि भारतीय लैब विश्वसनीयता खो चुकी है पर समय रहते समुचित प्रयास नहीं किए गये| यह जानते हुए भी कि वाडा एनडीपीएल पर करीबी नज़र गड़ाए है, भारतीय खेल प्राधिकरण और खेल मंत्रालय ने अपनी लेबोरेटरी को जाँचने-परखने या ठोक बजा कर देखने की ज़रूरत नहीं समझी| अब नतीजा सामने है|

अब नाडा खिलाड़ियों के मूत्र और खून के नमूने तो ले सकता है पर जाँच के लिए विदेशों में मान्यता प्राप्त लैब में भेजना होगा| जाहिर हैं खर्च बढ़ेगा| अब तक भारत के पड़ोसी देशों, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि के खिलाड़ियों के सैंपल भारतीय लैब में जाँचे जाते रहे जिनसे अच्छी आमदनी भी होती थी| अर्थात प्रतिबंध से भारतीय प्रतिष्ठा पर दोहरी मार पड़ी है और ऐसे में देश में खेलों को डोप रहित बनाने का नारा महज नारा बन कर रह जाएगा|

अंतरराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन नहीं करने पर नाडा की लैब की मान्यता समाप्त किए जाने का सीधा सा मतलब है क़ि देश में खेलों पर नियंत्रण रखने वाले मंत्रालय और खेल प्राधिकरण का काम काज सही हाथों में नहीं है|चूँकि देश की जगहंसाई हो रही है इसलिए ज़िम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्यवाही ज़रूरी है| यह ना भूलें कि टोक्यो ओलंपिक के लिए 11 महीनें का समय बचा है| भारतीय ओलंपिक संघ पहले ही कह चुका है कि देश का ओलंपिक आंदोलन प्रभावित हुआ है|

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