सुब्रतो कप: खानापूरी काफी नहीं

राजेंद्र सजवान
जो लोग भारतीय फुटबॉल की प्रगति का बखान कर रहे हैं या जिन्हें फ़ीफ़ा रैंकिंग में सुधार से अपनी फुटबॉल के सुधरने की महक आ रही है,उन्हें अब ख़ुशफ़हमी से बाहर निकल जाना चाहिए| सच्चाई यह है कि हमारी फुटबॉल दिन पर दिन पीछे हट रही है और फुटबॉल फ़ेडेरेशन भी कई सालों से झूठ पर झूठ बोले जा रहा है| हैरानी वाली बात यह है कि जिन संस्थाओं के दम पर हमारी फुटबॉल की पहचान बनी उनके कदम भी या तो ठिठक गये हैं या उन्हें भी कहीं कोई राह नज़र नहीं आ रही| मसलन भारतीय सेना और वायु सेना द्वारा आयोजित किए जाने वाले डूरंड कप और सुब्रतो मुकर्जी स्कूल फुटबॉल टूर्नामेंट|

डूरंड कप दुनिया के सबसे पुराने आयोजनों में से है, जबकि सुब्रतो कप भी ख़ासा पुराना है| 1888 में शुरू हुए इस टूर्नामेंट में कभी देश के टाप क्लब भाग लेते थे| दिल्ली के अंबेडकर स्टेडियम पर इस आयोजन ने अपने स्वर्णिम दिन बिताए| अँग्रेज़ों से मिली सौगात को भारतीय सेना ने वर्षों तक सजाया-सँवारा लेकिन अब यह आयोजन सेना को बोझ सा लगने लगा है| कभी दिल्ली तो कभी गोवा, कोलकाता और अन्य शहरों में डूरंड कप भागता फिर रहा है| इसमें दो राय नहीं कि सुब्रतो कप नें पिछले कुछ सालों में दुनियाभर के स्कूलों को आकर्षित किया है| यूरोप, लेटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के चैम्पियन स्कूल सुब्रतो कप में भाग ले रहे हैं| लड़कों के अंडर 14और 17 तथा लड़कियों के अंडर 17 टूर्नामेंट आयोजित करने से देश की सरकारों और आयोजक भारतीय वायुसेना का दायत्व पूरा नहीं हो जाता| बेशक सुब्रतो कप देश के स्कूलों को एक अच्छा प्लेटफॉर्म है लेकिन उम्र की धोखा धड़ी रोकने में असहाय रहा है|

हालाँकि सुब्रतो कप आयोजन समिति द्वारा प्रतिभावान खिलाड़ियों का चयन किया जाता है लेकिन चुने गये श्रेष्ठ को मंझधार में छोड़ना ठीक नहीं है| बेहतर होता कि एआईएफएफ ऐसे खिलाड़ियों को अपने बेड़े में शामिल करे| लेकिन फुटबॉल के ठेकेदारों को फ़ुर्सत ही नहीं है| भारतीय वायुसेना यदि एक कदम और बढ़ाए तो उसके प्रयासों से देश को बने बनाए खिलाड़ी मिल सकते हैं| वायुसेना और फ़ेडेरेशन को मिल बैठकर और परस्पर तालमेल से भविष्य की रूपरेखा पर ध्यान देना चाहिए| तब जा कर यह आयोजन सार्थक होगा| कुछ ऐसा करने की ज़रूरत है जिससे भारतीय फुटबॉल को बने बनाए खिलाड़ी सुब्रतो कप से मिल सकें|

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