ग्रीकोरोमन चारों खाने चित

राजेंद्र सजवान
कज़ाकिस्तान में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में भारतीय ग्रीको रोमन पहलवानों का प्रदर्शन एक बार फिर निराशाजनक रहा| हालाँकि बड़ी कामयाबी की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी| हो सकता है भारतीय कुश्ती फ़ेडेरेशन को भी इसी तरह के परिणाम की आशंका रही होगी लेकिन अधिकांश पहलवानों की शर्मनाक हार के मायने हैं कि कुश्ती की इस विधा में हमारे पहलवान बहुत पीछे चल रहे हैं| ज़्यादातर पहलवान अंकों का ख़ाता भी नहीं खोल पाए, बाउट जीतना तो दूर की बात है|

लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि जहाँ एक ओर हमारे फ्रीस्टाइल पुरुष एवम् महिला पहलवान विश्व और ओलंपिक स्तर पर रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन कर रहे हैं और प्रमुख देशों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं तो ग्रीको रोमन में तेज कदम क्यों नहीं बढ़ा पा रहे? भारतीय कुश्ती के जानकारों से पूछें तो अधिकांश का जवाब होता है कि ग्रीको रोमन शैली भारतीय पहलवानों के माफिक नहीं है, जिसका बड़ा कारण यह है कि भारत में कुश्ती का मतलब सिर्फ़ फ्रीस्टाइल है, फिर चाहे मुकाबला मिट्टी पर हो या मैट पर| देश में जितने भी अखाड़े चल रहे हैं उनमे से शायद ही किसी में ग्रीको रोमन के लिए अलग से व्यवस्था हो|

हालाँकि कुछ गुरु खलीफा दावा करते हैं कि उनके अखाड़े में दोनों शैलियों पर बराबर ध्यान दिया जाता है| सच्चाई यह है कि देश में पहलवानों की रोज़ी रोटी गाँव देहात और शहरों के बड़े दंगलों से हुई कमाई पर चलती है और ग्रीको रोमन नाम का एक भी दंगल कहीं पर भी आयोजित नहीं किया जाता| तो फिर इस शैली के पहलवान कहाँ से निकल पाएँगे! कोई माने या ना माने लेकिन ग्रीको रोमन कुश्ती का भारत में तब तक कोई भविष्य नहीं है जब तक विशुद्ध ग्रीको रोमन शैली के पहलवानों को बचपन से ट्रेनिंग नहीं दी जाती| अक्सर देखा गया है कि फ्रीस्टाइल के नाकाम पहलवान ग्रीको रोमन में कूद पड़ते हैं और मौका देख कर फ्री स्टाइल दंगलों में भी लड़ते देखे जा सकते हैं| ऐसे ग्रीको रोमन का भला नहीं होने वाला|

भारतीय कुश्ती फ़ेडेरेशन और देश में कुश्ती का कारोबार करने वाले जानते हैं कि विश्व स्तर पर ग्रीकोरोमन में दस और ओलंपिक स्तर पर छह भार वर्गों में पदक दाँव पर रहते हैं| लेकिन फ़ेडेरेशन ने शायद गंभीरता नहीं दिखाई है| बाजुओं की ताक़त और कमर तोड़ प्रदर्शन के लिए विख्यात यह शैली उच्च तकनीक पर टिकी है| भले ही ग्रीको रोमन शैली फ्रीस्टाइल की तरह आकर्षक ना हो, ओलंपिक पदकों की संख्या और रंग यहाँ भी एक समान हैं| लेकिन सुशील, योगेश्वर, बजरंग जैसे चैम्पियन ग्रीको रोमन के पास नहीं हैं| जार्जिया, रूस, जापान, अजरबेजान, कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, बुल्गारिया, हंगरी आदि देशों जैसे चैम्पियन पहलवान भारत के पास तब तक नहीं हो सकते जब तक इस शैली को अलग से और गंभीरता के साथ नहीं अपनाया जाता|

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