कुश्ती होगा राष्ट्रीय खेल!

राजेंद्र सजवान
‘हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है’, यह झूठ अब पाठ्य पुस्तकों से लगभग हटा दिया गया है| ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे भारत महान का कोई राष्ट्रीय खेल है ही नही| सालों पहले एक आरटीआई के जवाब में खेल मंत्रालय मान चुका है कि हॉकी को ऐसा कोई सम्मान मिला ही नहीं था| दरअसल, भारतीय हॉकी ने अपने आठ ओलंपिक स्वर्ण पदकों के दम पर आम भारतीय खेल प्रेमी के दिल दिमाग़ में अपनी अलग पहचान बना ली थी,जोकि धीरे धीरे मिटती चली गई| जिस खेल ने पिछले चालीस सालों में देश कोई कोई ओलंपिक पदक नहीं दिया हो, उसे आख़िर कब तक झेला जा सकता है| लेकिन जल्द ही भारत को अपना कोई राष्ट्रीय खेल मिल सकता है, और वह संभवतया कुश्ती होगा| हालाँकि इस बारे में अभी से किसी प्रकार का दावा नहीं किया जा सकता लेकिन बहुत जल्दी कुश्ती को राष्ट्रीय खेल बनाने की माँग भरतीय संसद में उठाई जा सकती है|

कुश्ती फ़ेडेरेशन के अध्यक्ष और सांसद ब्रज भूषण शरण सिंह और एक्टर सांसद रवि किशन सिंह ने बाक़ायदा इस मामले को संसद में उठाने का फ़ैसला कर लिया है| जी कुश्ती दंगल के लिए आयोजित कार्यक्र्म के चलते दोनों सांसदों ने फ़ैसला किया कि कुश्ती के दावे को ज़ोर शोर से उठाया जाएगा और एक राय से राष्ट्रीय खेल घोषित करने के लिए आग्रह किया जाएगा| देश के जाने माने खिलाड़ियों, खेल एक्सपर्ट्स, ओलंपिक पदक विजेताओं और खेल प्रेमियों का हॉकी से लगभग मोहभंग हो गया है और उन्हें लगता है कि कुश्ती को राष्ट्रीय खेल बनाया जाना ही श्रेयकर रहेग| कारण, कुश्ती विशुद्ध भारतीय खेल है और देश की माटी में रचा बसा है| दूसरी तरफ क्रिकेट और हॉकी जैसे खेल अँग्रेज़ों की दें रहे हैं| हॉकी अपनी पहचान खो चुकी है तो क्रिकेट लोकप्रिय हो सकता है पर ओलंपिक खेल नहीं है| मुक्केबाज़ी और निशानेबाज़ी में भी अच्छे रिजल्ट आ रहे हैं परंतु कुश्ती की तरह इन खेलों को आम भारतीय अपने दिल-दिमाग़ से नहीं पचा सकता| जब यह कहा जाता है कि कुश्ती भारत में रामायण-महाभारत काल या उससे भी पहले से प्रचलित है तो इस खेल के प्रति आस्था और विश्वास खुद ब खुद पैदा हो जाता है| कुश्ती के पक्ष में बड़ी बात यह है कि पिछले तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय पहलवानों ने पद्क जीतने का सिलसिला बनाए रखा है| केडी जाधव द्वारा जीते गये पहले पदक के बाद लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी लेकिन बीजिंग में सुशील के कांस्य के बाद लंदन में सुशील ने रजत और योगेश्वर ने कांस्य तथा रियो में साक्षी मलिक नें कांस्य पदक जीत कर कुश्ती को देश का पहला और विश्वसनीय खेल बना दिया है|

पूरे देश के गाँव-देहात और शहरों में कुश्ती की तूती बोल रही है| अमीर-ग़रीब घरानों के बच्चे पहलवानी कर रहे हैं| तारीफ की बात यह है कि महिला पहलवानों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है| जिन पहलवानों को कभी खेल पेजमें जगह नहीं मिल पाती थी उन्हें अख़बार के पहले पेज पर और चैनलों की मुख्य खबर के रूप में परोसा जा रहा है| बेशक, ऐसा दर्जा और सम्मान अन्य किसी ओलंपिक खेल को नही मिल पाया है| सुशील, योगेश्वर, विनेश, साक्षी, बजरंग, दीपक, रवि और दर्जनों अन्य पहलवान घर घर में चर्चा का विषय बने हैं| तो फिर ऐसे खेल को राष्ट्रीय खेल बनने से कौन रोक सकता है!

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