ओलंपिक में भारत: बस झूठ का कारोबार !

राजेंद्र सजवान

जैसे-जैसे टोक्यो ओलंपिक नजदीक आ रहा है, विदेश दौरों के लिए कुख्यात राष्ट्रीय खेल संघों, भारतीय ओलंपिक संघ और खेल मंत्रालय एवंम भारतीय खेल प्राधिकरण के अवसरवादियों ने अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है। गाहे बगाहे उन्होनें वही पुराना, बेसुरा और घिसा पिटा राग अलापना शुरु कर दिया है। अपने अपने स्तर पर उन्होंने टोक्यो में भारतीय खिलाडिओं द्वारा जीते जाने वाले पदकों का हिसाब किताब लगाना प्रारम्भ कर दिया है।

इस खेल में जाने माने खेल पंडित, मीडिया का एक भटका हुआ वर्ग, न्यूज़ एजेंसियों के यस मैन और खेल संघों और खेल मंत्रालय के तथाकथित एक्सपर्ट बढ़चढ़ कर भागीदारी निभा रहे हैं। लेकिन जब देश का खेल सचिव कुर्सी संभालते ही दावा कर दे कि भारतीय खिलाड़ी टोक्यो ओलंपिक में 50 पदक जीत सकते हैं तो आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है| लेकिन कुछ भी नया नहीं है| हर ओलंपिक से पहले ऐसा ही होता है| कारण, भारतीय खेलों के मठाधीस जानते हैं कि हमारे खिलाड़ी कितने पानी में हैं और उनमे पदक जीतने का कितना माद्दा है|

लेकिन यदि सच पहले ही बोल दिया जाए तो खेल मंत्रालय, आईओए और खेल संघों के मौका परस्त ओलंपिक का टिकट कैसे पा सकते हैं| नतीजन खिलाड़ियों के साथ साथ अधिकारी भी चोर दरवाजे से ओलंपिक, एशियाड और तमाम आयोजनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते आ रहे हैं| लंदन ओलंपिक में छह पदक जीतने के बाद तमाम ज़िम्मेदार इकाइयों, मीडिया हाउस और कार्पोरेट जगत नें रियो ओलंपिक में दस से बीस पदक जीतने का दावा ठोक दिया परंतु मिले सिर्फ़ दो|

भला हो सिंधु और साक्षी का जिनके प्रदर्शन ने भारतीय प्रतिष्ठा को नंगा होने से बचा लिया| वरना 15वें दिन तक भारत के खाते में एक भी पदक नहीं चढ़ा था| बेशक, सब्जबाग दिखाने वालों का तो चरित्र झूठ बोलने का रहा है। सवाल यह पैदा होता है कि कौन कौन से खेल हैं जिनमें भारतीय खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद की जा रही है? हॉकी से जोकि पिछले 40 साल से ओलंपिक पदक के लिए तरस रही है? एथलेटिक से जोकि सौ साल में कांस्य तक नहीं जीत पाई? फुटबॉल, बास्केटबाल,तैराकी, जिमनास्तिक, जूडो, टेनिस और तमाम लोकप्रिय खेलों में पदक के लिए शायद एक और सदी तक इंतजार करना पड़े|

लेदेकर, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, निशानेबाज़ी और बैडमिंटन में भारतीय खिलाड़ी देश के खेल प्रेमियों को निहाल कर सकते हैं| लेकिन जो बेवजह बवंडर खड़ा कर रहे हैं और 12, 15 या बीस पदक जीतने की हुंकार भर रहे हैं, उनका इरादा नेक नहीं है| सीधे सीधे सरकार को गुमराह करने की साजिश रची जा रही है|

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