काहे के ब्ल्यू टाइगर्स!

राजेंद्र सजवान
भारतीय टीम के कोच इगोर स्तिमाक चाहे कोई भी बहाना बनाएँ, अपना और खिलाड़ियों का बचाव करें पर बांग्लादेश से अंक बाँटने का सीधा सा मतलब है कि भारतीय फुटबॉल में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा और करोड़ों खर्च करने औरअंतरराष्ट्रीय अनुभव दिलाने के नाम पर अब तक सिर्फ़ गोरख धंधा चल रहा था| वरना क्या कारण है कि फ़ीफ़ा रैंकिंग में 187वें पायेदान पर खड़ी बांग्लादेश से हारते हारते बचे| भारत 104 नंबर पर है| जिन खिलाड़ियों को ब्ल्यू टाइगर कहा जा रहा था उनके खेल में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया जिसे लेकर बांग्ला टाइगर्स को कमतर आँका जा सके|

कतर से ड्रॉ खेल कर सातवें स्थान पर जा चढ़ी भारतीय टीम का गुरूर खुद पर भारी पड़ा| अपने समर्थकों, अपने मैदान और अपने माहौल में खेल रहे भारतीय खिलाड़ियों के खेल में ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया जिसे देख कर यह कहा जा सके कि विदेशी कोाचों के सिखाने पढ़ाने का कुछ फ़ायदा हुआ है| लेकिन दोष सिर्फ़ खिलाड़ियों या कोच का नहीं है| जिस संस्था का मुखिया भ्रष्टाचार की दलदल में फँसा हो और जिसने फुटबॉल को अपनी जागीर बना रखा हो उसकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती| फुटबॉल को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले प्रफुल पटेल साहब पर आरोप है कि उनके दाऊद और इकबाल मिर्ची की पत्नी के साथ कारोबारी संबंध हैं, जिनकी जाँच चल रही है|

पटेल साहब एयर इंडिया मामले में पहले ही फँसे हुए हैं और अब फुटबॉल घोटाले में भी उनकी फ़ेडेरेशन को असली गुनहगार माना जा रहा है| ऐसे व्यक्ति की छाया में चल रही फुटबॉल से भला क्या उम्मीद की जा सकती है! कतर से बराबरी का मुकाबला खेलने वाली भारतीय टीम का हाजमा इतना खराब हो चुका था कि उसने बांग्लादेश को कोई भाव ही नहीं दिया| सच्चाई यह है कि बांग्ला खिलाड़ी मेजबान की तुलना में कहीं बेहतर खेले| किसी भी पल दबाव में नज़र नहीं आए, जबकि भारतीय खिलाड़ियों के खेल में तालमेल की कमी और एकजुटता का अभाव दिखाई दिया|

जीतने का दृढ़ संकल्प और टीम भावना तो कतई नज़र नहीं आए| हैरानी वाली बात यह है कि ज़्यादातर खिलाड़ियों ने गेंद रोकने और पास देने का सलीका भी ढंग से नहीं सीखा| यह हाल तब है जबकि अधिकांश आईएसएल में बड़े क्लबों से खेलते हैं| बांग्लादेश के विरुद्ध खेले गये मैच के परिणाम से यह भी साफ हो गया है कि कतर से खेला बराबरी का मैच भी महज तीर तुक्का था| कुल मिला कर अब वर्ल्ड कप क्वालीफायर में आगे बढ़ने का रास्ता मुश्किल हो गया है| यह भारतीय फुटबॉल का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि वर्षों तक दास मुंशी जैसे नेता अपने इशारे पर नचाते रहे और अब पटेल और उनके फुटबॉल हाउस की तानाशाही से खेल बिगड़ गया है|

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