विदेशी कोच भी फ्लॉप

राजेंद्र सजवान
विश्व कप और एशियन चैंपियनशिप के क्वालीफायर मुक़ाबले में भारतीय फुटबॉल टीम ने जिस प्रकार का खेल बांग्लादेश के विरुद्ध खेला उसे देख कर एक बात तो साफ हो गई है कि विदेशी कोचों के आने के बाद भी भारतीय फुटबॉल में कोई बदलाव नहीं हुआ हैऔर नाही आईएसएल के आयोजन से खेल का स्तर सुधरा है| इसके साथ ही एक बार फिर से माँग की जाने लगी है कि भारतीय फुटबॉल के कर्णधार आज और अभी से ग्रास रुट पर ध्यान दें और हो सके तो बेहतर कोाचों को बुनियादी स्तर पर सिखाने पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाए| कुछ माह पहले जिस कप्तान ने फुटबॉल प्रेमियों को हाथ जोड़ कर मैच देखने और प्रोत्साहन देनेकी अपील की थी वह भी मान रहा है कि टीम ने स्तरीय प्रदर्शन नहीं किया और उम्मीद पर खरी नहीं उतरी| अर्थात खिलाड़ियों का मनोबल डोलने लगा है| हालाँकि कोच इगोर अपनी खाल बचाने के लिए भरसक प्रयास में लगे हैं और कतर के खिलाफ ड्रॉ खेलने का श्रेय लूटने के बाद अब कह रहे हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को हर क्षेत्र में सुधार की ज़रूरत है |

लेकिन वह अकेले पलटी खाने वाले कोच नहीं हैं| पिछले चालीस सालों से दुनियाँभर के विदेशी भारत को सोया शेर, ब्ल्यू टाइगर्स और ना जाने क्या क्या संबोधन देकर बरगलाते आ रहे हैं| नतीजन अपने कोच पता नहीं कहाँ गायब हो गये हैं| हैरानी वाली बात यह है कि एक तरफ तो देश की सरकार और आम जनमानस भारत को फुटबॉल राष्ट्र बनाने के लिए प्रयासरत हैं, लाखों- करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ टीम के प्रदर्शन में कतई सुधार नहीं हुआ है| अपने से 83 रैंक नीचे के बांग्लादेश से हार बचाने वाली टीम का मनोबल गिरना स्वाभाविक है| साथ ही यह माँग भी की जाने लगी है कि सब जूनियर और जूनियर खिलाड़ियों को जब तक विदेशी कोचों के हवाले नहीं किया जाता सुधार नहीं हो सकता| राष्ट्रीय सीनियर खिलाड़ियों पर फ़िजूल खर्ची बंद कर ग्रास रूट पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाए तो कुछ सालों में भारतीय फुटबॉल बदल सकती है|

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