अभिशाप बने हॉकी स्टेडियम

राजेंद्र सजवान
देश की सरकारें, खेल मंत्रालय और खेल संघ भले ही खेलों के विकास और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने का ढोल पीटें लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी गंभीर नहीं है| हैरानी वाली बात यह है जिस खेल को हम वर्षों तक राष्ट्रीय खेल का गीदड़ पट्टा टाँग कर घुमाते-फिराते रहे उसके प्रति भी सदभावन्ना और सम्मान नज़र नहीं आता| वरना क्या कारण है कि देश के तमाम हॉकी टूर्नामेंट एक एक कर दम तोड़ रहे हैं| नेहरू हॉकी टूर्नामेंट का उदाहरण सामने है| 1964 में स्थापित यह आयोजन साल दर साल पहचान गँवा रहा है| जिस आयोजन में कभी विदेशी टीमें भाग लेने आती थीं, जिसे देश का श्रेष्ठ टूर्नामेंट कहलाने का गौरव प्राप्त था, और जिस में खेल कर खिलाड़ी धन्य हो जाता था उसकी हालत अच्छी नहीं है|

बल्कि यूँ कह सकते हैं कि यह आयोजन कभी भी दम तोड़ सकता है| कारण, सरकार और हॉकी के कर्णधारों नें कभी भी हॉकी को वह सम्मान नहीं दिया जिसकी हकदार थी| हो सकता है नेहरू हॉकी टूर्नामेंट सोसाइटी से भी कहीं कोई चूक हुई हो या वक्त के साथ खुद को बदलने में नाकाम रही लेकिन देश में किसी भी हॉकी आयोजन को बचाने और आगे बढ़ाने का दायत्व सरकारों का बनता है| जिस खेल ने भारत को पहचान दी उसके प्रति दुर्भावना और तिरस्कार का ही नतीजा है कि पिछले चालीस सालों में भारत कोई ओलंपिक पदक नहीं जीत पाया|

कभी जिस शिवाजी स्टेडियम को भारतीय हॉकी का दिल कहा जाता था और जिस पर सैकड़ों नामी खिलाड़ियों ने खेल के जौहर दिखाए, वह अब हॉकी आयोजनों के योग्य नहीं रहा या ऐसा भ्र्म फैलाया जा रहा है| नतीजन ज़्यादातर आयोजन ध्यान चन्द नेशनल स्टेडियम पर किए जा रहे हैं जोकि हॉकी के अभिशाप के रूप में जाना जाता है| यहीं पर पाकिस्तान नें 1982 के एशियाड फाइनल में भारत को 7-1 से पीटा था| अब यह स्टेडियम सुरक्षा कारणों से आम हॉकी प्रेमी और खिलाड़ी की पहुँच से बाहर है| वैसे भी नेशनल स्टेडियम हॉकी के लिए आदर्श आयोजन स्थल नहीं है|

देखा जाए तो शिवाजी स्टेडियम और नेशनल स्टेडियम की बदहाली के लिए सरकार, हॉकी इंडिया साई और नगर पालिका सबसे बड़े गुनहगार हैं, जिन्होने अपने अहंकार के चलते कभी भी खेल, खिलाड़ियों और हॉकी प्रेमियों की भावनाओं को नहीं समझा| नेहरू, शास्त्री, रणजीत सिह, सुरजीत सिंह और कई अन्य टूर्नामेंट यदि आखरी साँसें ले रहे हैं तो उन्हें डुबोने वाले अपने ही हैं| लेकिन हर साल पाँच राष्ट्रीय स्तर के बड़े आयोजन करने वाले नेहरू हॉकी को यदि समय रहते सहयोग और समर्थन नहीं मिला तो देश में हॉकी का सबसे ब्डा कारखाना ढ़ह सकता है| बेहतर होगा आयोजक, हॉकी इंडिया, सरकार और नगर पालिका परिषद कोई हल निकालें और हॉकी को फिर से शिवाजी स्टेडियम पर लौटा लाएँ, जोकि उसका असली घर है|

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