खेल मैदान बने कब्रिस्तान?

राजेंद्र सजवान
भले ही दिल्ली दुनियाँ का सबसे ज़्यादा प्रदूषित, आपराधिक, गंदा और भद्ददा शहर क्यों ना हो, लेकिन भारत की राजधानी के साथ एक बड़ा गौरव यह जुड़ा हुआ है कि एशिया के सबसे बड़े खेल मेले के रूप में पहले एशियाई खेलों का आयोजन 1951 में यहीं पर किया गया था| इस आयोजन के बाद एशियाई देशों में भारत का कद ख़ासा उँचा उठ गया था| भारतीय खेल प्रेमियों ने खेलों में देश के महाशक्ति बनने के ख्वाब देखने शुरू कर दिए थे|

फिर 1982 में एक बार फिर एशियाई खेलों की दिल्ली वापसी हुई और 2010 में यहीं पर कामनवेल्थ खेलों का आयोजन किया गया| अर्थात भारत ने जो अब तक के सबसे बड़े खेल आयोजन किए उनको आयोजित करने का श्रेय देश की राजधानी को ही मिला है| लेकिन खेलों में आज दिल्ली कहाँ खड़ी है और दिल्ली के खेल आयोजन स्थलों का क्या हाल है, इस पर सरसरी नज़र डालें तो घोर निराशा होती है| पहले एशियाड का आयोजन स्थल मुख्यरूप से नेशनल स्टेडियमथा जिसे बाद में हॉकी स्टेडियम बना दिया गया| दूसरे एशियाड के लिए नेहरू स्टेडियम, तालकटोरा तरणताल, इंदिरा गाँधी इनडोर स्टेडियम, तुगलकाबाद शूटिंग रेंज और अन्य कई स्टेडियम बनाए गये और कुछ एक को नया रूप दिया गया| दूसरे एशियाड आयोजन के बाद कहा गया कि दिल्ली को भारतीय खेलों का दिल बनाया जाएगा और तमाम बड़े आयोजन यहीं पर होंगे| लेकिन ऐसा नहीं हो पाया|

उल्टे कई बड़े स्थानीय और राष्ट्रीय आयोजन ठप्प हो गये| ऐसा इसलिए क्योंकि देश के खेलों के संचालन का जिम्मा भारतीय खेल प्राधिकरण नाम के सफेद हाथी के हाथों चला गया जिसने एक एक कर लाखों-करोड़ों के स्टेडियमों को बर्बाद कर रख दिया| नतीजन आज दिल्ली के पास श्रेष्ठ कहा जाने वाला कोई स्टेडियम नहीं बचा| नेशनल और शिवाजी स्टेडियम से हॉकी लगभग लुप्त हो चुकी है तो अंबेडकर स्टेडियम फुटबाल का मक्का नहीं रहा| डीसीएम कप की मौत और डूरंड कप के दिल्ली बाहर होने के बाद से फुटबाल लगभग नदारद हो चुकी है| फुटबाल और एथलेटिक के लिए स्थापित नेहरू स्टेडियम जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है| एथलेटिक ट्रैक और फुटबाल मैदान दिल्ली के खेल आकाओं को मुँह चिढ़ा रहे हैं|

जिस स्टेडियम में एशिया के टाप फुटबाल खिलाड़ियों और ओलंपिक एवम् वर्ल्ड चैम्पियन एथलीटों ने कभी जौहर दिखाए, वह साई और खेल मंत्रालय के झूठे दावों की पोल खोल रहा है|स्टेडियमों के रख रखाव में तमाम सरकारें नाकाम रहीं| नतीजन, अधिकांश खेल आयोजन या तो काल के गाल में चले गये या दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गये| यूँ भी कह सकते हैं कि खेल आयोजनों की नगरी खेलों के कब्रिस्तान में बदल गई है|

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