माइकल फेलप्स से क्यों शर्मिंदा हैं भारतीय खेल?

राजेंद्र सजवान
देश का खेल मंत्रालय और उसके काबिल अधिकारी भारत को 2028 के ओलंपिक तक खेल महाशक्ति बनाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं और बाक़ायदा भारतीय खेलों की प्रगति के लिए खाका भी तैयार कर लिया गया है| खेलो इंडिया, फिट इंडिया और अनेकों प्रॉजेक्ट द्वारा खेलों की हालत सुधारने के प्रयास चल निकले हैं| यह तो वक्त ही बताएगा कि कितनी कामयाबी मिल पाती है| यदि सचमुच भारत खेलों के लिए गंभीर है तो उसे अमेरिका और चीन जैसी खेल महा शक्तियों के नक्शे कदम पर चलना होगा, जिनके पास चैम्पियनों की भरमार है|

यह ना भूलें कि ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने 1900 से 2016 के रियो ओलंपिक तक जीतने पदक जीते हैं, उतने पदक एक अकेले अमेरिकी तैराक के खाते में जमा हैं| माइकल फ्रेड फेलप्स नाम के इस तैराक को दुनिया का सर्वकालीन सफलतम और श्रेष्ठतम ओलंपियन माना जाता है| ओलंपिक महाशक्तियों से टकराने का दम भरने वाले हमारे भारत महान के लगभग 1100 खिलाड़ियों ने अब तक 28 पदक जीत कर देश का गौरव बढ़ाया है, जबकि अकेले फेलप्स ने तीन ओलंपिक खेल कर इतने ही पदक जीते हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि उसने 23 स्वर्ण, तीन रजत और दो कांस्य जीते जबकि भारत के खाते में नौ स्वर्ण, सात रजत और बारह कांस्य पदक हैं|

खैर, तैराकी में तो भारत अब तक ख़ाता नहीं खोल पाया है पर हॉकी के आठ और निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा का एक स्वर्ण भारतीय खिलाड़ियों की महानता की कहानी बयाँ करते हैं| एथलीट कार्ल लुईस, पावो नुर्मी, तैराक मार्क स्पिट्ज़ और जिमनास्‍ट लारिसा ने भी अकेले दम पर नौ स्वर्ण पदक जीते हैं| यह तो पता नहीं कि देश का खेल मंत्रालय और भारतीय खेल प्राधिकरण क्या सोच कर बड़े बड़े दावे कर रहे हैं लेकिन किसी को भी यह पता नहीं कि सात महीनें बाद टोक्यो में कौन कौन खिलाड़ी पदक जीत सकते हैं| दूसरी तरफ अमेरिका, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, जमैका और तमाम चैम्पियन देशों को पता है की उनका दावा किन किन खेलों में एकदम पक्का है|

झूठे दावों, धोखाधड़ी और देशवासियों के खून पसीने की कमाई पर टिके भारतीय खेलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो फेलप्स का रिकार्ड है| पता नहीं वह दिन कब आएगा जब हमारे खिलाड़ी अमेरिकी तैराक के प्रदर्शन से आगे बढ़ पाएँगे!

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