ग़रीबी और अभाव से बनते हैं चैंपियन फुटबॉलर

राजेंद्र सजवान
भारतीय फुटबाल पर सरसरी नज़र डालें तो अधिकांश स्टार खिलाड़ी बेहद ग़रीब और निम्न परिवारों से निकल कर आए हैं| फिर चाहे मेवा लाल, पीके बनर्जी, जरनैल सिंह, बलराम, मगन सिंह, इंदर सिंह, श्याम थापा, पीटर थन्गा राजन, सुरजीत सेन गुप्ता, प्रसून बनर्जी हों या परमिंदर सिंह, बाई चुंग भूटिया, विजयन और सुनील छेत्री| विश्व स्तर पर देखें तो ब्राज़ील से लेकर जर्मनी तक के महान खिलाड़ियों ने भी साधारण घरों से निकल कर पूरी दुनिया में अपने कौशल का सिक्का जमाया है|

यूरोप, लेटिन अमेरिका और अफ्रीका के देश लगातार महान और बहुमूल्य फुटबालर पैदा कर रहे हैं जिन्हें विश्व फुटबाल के बाजार में लाखों करोड़ों डालर में खरीदा बेचा जाता है| एक अनुमान के अनुसार पिछले दस वर्षों में ल्योन मेस्सी और रोनाल्डो आठ हज़ार करोड़ रुपयों से ज़्यादा कमाए| अर्थात उनको मिलने वाली धनराशि इतनी है, जितनी भारतीय फुटबाल ने पिछले बीस सालों में खर्च नहीं किए| महानतम खिलाड़ियों में शामिल मेस्सी और रोनाल्डो ग़रीब परिवारों से निकले और पूरी दुनियाँ में छा गये|

ब्राज़ील के पेले और अर्जेंटीना के माराडोना को शीर्ष खिलाड़ियों की कतार में शीर्ष पर शामिल किया जाता है| पेले और माराडोना के परिवारों की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी लेकिन फुटबाल ने उन्हें ना सिर्फ़ धनाढ्य बनाया अपितु बड़ी से बड़ी हस्तियाँ उनके सामने सिर झुकाती हैं| विश्व फुटबाल में रिकार्ड तोड़ अनुबंध करने वाले ब्राज़ील के स्टार खिलाड़ी नेमार जूनियर भी बेहद ग़रीब परिवार में पैदा हुए और आज उन्हें मेस्सी और रोनाल्डो की कतार में स्थान प्राप्त है| ऐसा नहीं है कि भारत में प्रतिभाओं की कमी है और हम चैम्पियन खिलाड़ी पैदा नहीं कर सकते| यह भी ज़रूरी नहीं कि लाल सिर्फ़ गुदडी में ही पैदा होते हों| लेकिन फुटबाल जैसे खेल में यह माना जाता है कि ब्रेड-बटर पर पलने वाले बच्चों की बजाय रफ-टफ जीवन जीने वाले ज़्यादा सफल रहते हैं|

यह भी संभव है कि संभ्रांत और धनी परिवारों के खिलाड़ी अपनी मेहनत और लगन से नाम कमा सकते हैं| फुटबाल पंडितों और पूर्व चैम्पियनों का मानना है कि भारत को यदि फुटबाल में ताक़त के रूप में उभरना है तो ग़रीब परिवारों, गंदी बस्तियों और अभाव की दुनिया में जीने वाले बच्चों और युवाओं को तलाशना और तराशना होगा| हालाँकि नार्थ ईस्ट, बंगाल, आंध्र प्रदेश और कुछ अन्य प्रदेश इस दिशा में प्रयासरत हैं| लेकिन अभी बहुत काम करना बाकी है|

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