ऑस्ट्रेलियन ओपन में किया मोटर्स के बालकिड्स

राजेंद्र सजवान
भारतीय टेनिस की हालत इस कदर बाद से बदतर हो चुकी है कि खिताब जीतना तो दूर किसी बड़े आयोजन में भाग लेने का सौभाग्य भी बहुत कम अवसरों पर प्राप्त हो पाता है| शून्य सफलता के साथ साल का समापन करने वाली भारतीय टेनिस की शुरुआत भी शून्य के आस पास हुई है| यह कहते हुए बड़ा अजीब सा लगता है कि भारत में टेनिस खिलाड़ी लगभग ऐसे ही लुप्त हो गये हैं जैसे कि आस्ट्रेलिया का जंगलों से कई प्रजातियाँ आग की विभीषिका से लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं| आग में बहुत कुछ खोने के बाद भी आस्ट्रेलिया नें कमर कस कर साल केपहले ग्रांड स्लैम टूर्नामेंट, ‘आस्ट्रेलियन ओपन’ के आयोजन को विधिवत जारी रखने का फ़ैसला किया है| दुनियाँ के तमाम स्टार खिलाड़ी आस्ट्रेलिया में खेल रहे हैं और आस्ट्रेलियन ओपन खेल कर मेजबान देश की हिम्मत और खेल भावना को साधुवाद कह रहे हैं| राफ़ेल नडाल, सेरेना, रोजर फेडरर, जोकोविच, स्टेफनोस, स्टीव जानसन जैसे धुरंधर खिलाड़ी खिताब के दावेदारों मे शामिल हैं| लेकिन भारतीय भागीदारी पर एक बार फिर से ग्रहण लगा है| भारतीय उम्मीदें प्रज़नेश और सुमित नागल पर टिकी थीं लेकिन दोनों ही क्वालीफायर से आगे नहीं बढ़ पाए लेकिन भाग्य ने प्रज़नेश का साथ दिया और उसे क्वालीफायर में हराने वाले खिलाड़ी द्वारा नाम वापस लेने के कारण मुख्य ड्रॉ में स्थान मिल गया है| भले ही एक भारतीय खिलाड़ी आस्ट्रेलियन ओपन के मुख्य ड्रॉ में खेलता नज़र आएगा लेकिन किया मोटर्स द्वारा चुने गये दस प्रतिभावान बच्चे बालकिड्स के रूप में भारतीय प्रतिनिधित्व की रस्म अदायगी करेंगे| इनमें दिल्ली से दिव्यांशु पांडे और हार्षिता पंडिता, हैदराबाद से आदित्य बीएमवी और संस्क्रुती, अहमदाबाद से अथर्वा हितेंद्र, कोलकाता से अत्रिजो सेनगुप्ता, पंजाब से रिजुल भाटिया, सरगम सिंगला और यशवर्धन गौर और मुंबई से शार्विन कौस्तुभ शामिल हैं। आस्ट्रेलियन ओपन बॉलकिड्स इंडिया प्रोग्राम के दूसरे सीजन के लिए इस बार 10 शहरों में ट्रायल्स का आयोजन किया गया था, जहां आस्ट्रेलियन ओपन के अधिकारियों ने 250 बच्चों में से अंतिम 10 बच्चों का चयन किया। अर्थात भारत की भागीदारी मैच देखने और बॉल उठाने तक सीमित रहेगी| यह स्थिति सचमुच बेहद शर्मनाक है| जिस देश ने कभी राम नाथन कृष्णन, रमेश कृष्णन, विजय अमृत राज जैसे महान खिलाड़ी पैदा किए और लीयेंडर पेस, महेश भूपति आदि खिलाड़ियों ने जिस परंपरा को आगे बढ़ाया, उसका शायद लोप हो गया है| जिस खेल में हमारे पास कुछ एक योद्धा रहे उस खेल का नाम तक लेने वाला नहीं बचा| ज़ाहिर है किसी भारतीय का ग्रांड स्लैम जीतने का सपना शायद किसी चमत्कार से ही पूरा हो पाएगा|

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