सुनील सा ना कोय!

राजेंद्र सजवान
पिछले कुछ महीनों में भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान सुनील क्षेत्री को लेकर मीडिया की उत्सुकता ज़्यादातर इस बात को लेकर रही है कि वह कब सन्यास ले रहे हैं| यह सही है कि वह 35 साल के हो गए हैं और उनके पास अब बहुत ज़्यादा समय नहीं बचा है| चूँकि एक ना एक दिन हर खिलाड़ी को रिटायर होना पड़ता है इसलिए क्षेत्री भी कुछ एक मैच या कुछ एक साल खेल कर बूट टाँग सकते हैं| मीडिया या क्षेत्री के चाहने वालों की उत्सुकता शायद यह जानने में ज़्यादा है कि वह कितने फिट हैं और अभी कितने समय तक मैदान में डटे रह सकते हैं| हालाँकि, राष्ट्रीय टीम के लिए या आईएसएल में खेलते हुए वह आज भी ख़ासे स्वाभाविक लगते हैं|

फिरभी पाँच-दस साल पहले के खिलाड़ी के मुक़ाबले वह शायद कम उर्जावान हो सकते हैं| हालाँकि क्षेत्री ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि वह उर्जा से भरे हैं और तब तक खेलते रहेंगे जब तक खुद को फिट महसूस करते हैं| लेकिन अब भारतीय फुटबाल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सुनील क्षेत्री के बाद कौन भारतीय फुटबाल की पहचान बनेगा! उनसे पहले बाई चुंग भूटिया का दौर था और कुछ अन्य खिलाड़ी टीम को बल प्रदान कर रहे थे| लेकिन फिलहाल भारतीय फुटबाल में एक भी ऐसा खिलाड़ी नज़र नहीं आ रहा जोकि उनका स्थान ले सके, जिस पर भरोसा किया जा सके|

जिस खिलाड़ी को ल्योन मेस्सी और रोनाल्डो की तरह प्रतिभावान और गोल जमाने में माहिर माना जाता है उसके खाली स्थान की भरपाई रातों रात तो हो नहीं सकती| संयोग से इस संवाददाता ने सुनील को उसके स्कूली दिनों से खेलते देखा है| मोतीबाग स्कूल में खेले जानेवाले देवरानी मेमोरियल इंटर स्कूल फुटबाल टूर्नामेंट में जब सुनील ने आर्मी पब्लिक स्कूल के लिए हुनर दिखाया तो ममता मॉडर्न स्कूल ने उसे अपने बेड़े में शामिल कर लिया और यहीं से उसकी विकास यात्रा की असल शुरुआत हुई| पहले एशियन स्कूल टूर्नामेंट और तत्पश्चात देश के टाप क्लबों से खेलते हुए वह बढ़ता चला गया| वह अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी से उस मुकाम तक पहुँचा है जहाँ कोई भारतीय फुटबालर नहीं पहुँच पाया|

ज़ाहिर है उसके जाने के बाद भारतीय फुटबाल में एक बड़ा सूनापन आनेवाला है| ऐसा इसलिए क्योंकि हर टीम को एक मैच विजेता खिलाड़ी चाहिए होता है| ऐसा खिलाड़ी जोकि टीम और देश को कठिन समय में उबारने का माद्दा रखता हो और सुनील ने पिछले डेढ़ दसक में ऐसा अनेकों बार किया| छोटे कद के बावजूद भी वह बड़े गोल दागने की योग्यता रखता है और हारी बाजी को जीत में बदल सकता है| ऐसा खिलाड़ी भारतीय फुटबाल को आने वाले पाँच-सात सालों में नहीं मिलने वाला| हाँ, कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है|

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