खयाल अच्छा है ग़ालिब दिल बहलाने केलिए

राजेन्द्र सजवान
ओलंपिक पदक की भूख भारतीय लोकतंत्र को किस तरह सता रही है, हाल के कुछ प्रकरणों से साफ हो जाता है। कुछ महीनों के अंतराल में ऐसे फर्राटा धावकों को ओलंपिक इतिहास के महानतम एथलीट जमैका के उसैन बोल्ट समान बता दिया गया जिन्हें पहले कोई जानता भी नहीं था। मध्य प्रदेश के रामेश्वर गुर्जर और कर्नाटक के श्रीनिवास गौड़ा न सिर्फ देश के मीडिया ने हीरो बना दिया अपितु खेल मंत्री और भारतीय खेल प्राधिकरण ने उनके प्रदर्शन को बिना सोचे समझे भाव दिया और यह दर्शाया कि भारत में खेलों की समझ रखने वाले और खिलाड़ी एवम खेल की परख करने वालों की हालत किस कदर दयनीय है। या यूं भी कह सकते हैं कि पदक और प्रदर्शन की आधी अधूरी खबर से भी देश के खेल आका पगला जाते हैं और अनाप शनाप बयान बाजी में लग जाते हैं।

गुर्जर ने 11 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ पूरी की तो मध्य प्रदेश के खेल मंत्री और स्थानीय मीडिया ने बिना कोई प्रमाण और परीक्षा के गुर्जर को एमपी का उसैन बोल्ट करार दिया। उसे राष्ट्रीय हीरो बना दिया गया। लेकिन जब उसकी परीक्षा ली गई तो फेल हो गया। गौड़ा ने भैंसे के साथ दौड़ लगाई और जोड़ घटा के बाद पता चला कि उसने 9.95 सेकंड में दौड़ पूरी कर बोल्ट का रिकार्ड तोड़ दिया। गुर्जर की तरह उसे भी जिम्मेदार अधिकारियों ने बधाई संदेश भेजे,ट्वीट किए गए और उसे साईं ने ट्रायल का बुलावा भी भेज दिया।

हालांकि उसने खुद ही ट्रायल देने से इनकार कर दिया है। अब कुछ और भारतीय बोल्ट चर्चा में आ गए है। भैंसों और गाड़ियों के साथ दौड़ने वााले खबरों में हैैं। अब निशांत शेट्टी ने भैंसे के साथ दौड़ते हुए 9.52 सेकंड का रिकार्ड स्थापित कर बोल्ट का रिकार्ड ध्वस्त कर दिया है| पता नहीं भारतीय मीडिया और सरकारी तंत्र को क्या हो गया है कि इस प्रकार के अनाप शनाप और तमाशेबाजी वाले प्रदर्शनों को महत्व दिया जा रहा है और महान एथलीट उसैन बोल्ट कौफास का पात्र बनाया जा रहा है|


यह ना भूलें कि बोल्ट तक पहुँचने के लिए भारतीय धावकों को अभी सौ और साल लग सकते हैं| दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने सौ साल से भी अधिक समय में दौड़ कूद के ओलंपिक पदक का वरण नहीं किया है। ओलंपिक दर ओलंपिक खाली हाथ और अपमान के साथ लौटने की परंपरा सी बन गई है। बड़े बड़े दावों के साथ भारी भरकम दल जाते हैं और थू थू के साथ लौटते हैं। बेशक, एथलेटिक में भारत दुनिया का सबसे फिसड्डी देश है।

एथलेटिक पर करोड़ों खर्च किये जा रहे हैं। सरकार की प्रतिभा खोज योजनाएं चल रही हैं। कई एथलीट ओलंपिक की तैयारी में जुटे हैं। जिनका पूरा खर्च सरकार उठा रही है। लेकिन पदकों के भूखे देश का ध्यान काल्पनिक लगने वाली कहानियों की तरफ ज्यादा है| हैरानी तब होती है जब देश के खेल मंत्री और राज्यों के खेलविभाग एवम् साई के अधिकारी भैंसॉं और बैलगाड़ियों के पीछे दौड़ रहे हैं| यदि ऐसे प्रतिभा खोजी कार्यक्र्म चलाए जा रहे हैं तो इस देश के खेलों का भला तो भगवान भी नहीं कर पाएँगे|

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