लिम्बा राम:कहीं जिंदगी की जंग ना हार जाए, तीरन्दाज़ी का सुपर स्टार!

राजेन्द्र सजवान
लगभग तीस साल पहले राजस्थान के आदिवासी युवक लिम्बा राम की तीरन्दाज़ी के चर्चे आम थे। उसके हर निशाने पर देश के लिए पदक बरसते थे और वह हर खिलाड़ी के लिए आदर्श माना जाता था| तब वह भारतीय खेलों का सुपर हीरो था लेकिन आज वही लिम्बा दाने दाने के लिए मोहताज़ है। मस्तिष्क की गंभीर बीमारी के चलते वह गुमनाम जिंदगी जीने के लिए विवश है।

जो कभी मीडिया की सुर्खियों में रहता था आज कोई उसकी खोज खबर नहीं लेना चाहता। गाजियाबाद के KIET संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में लिम्बा अपनी पत्नी जेनी के साथ मौजूद थे। खेलो इंडिया के निदेशक द्रोणाचार्य अजय बंसल (मुख्य अतिथि), पेफी के सचिव पियूष जैन, बास्केट बॉल की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सिंह बहनें और अन्य की उपस्थिति में लिम्बा को सम्मानित किया गया।

कभी उसकी अचूक निशानेबाजी को देखकर यह माना जा रहा था कि भारत के लिए वह ओलंपिक पदक जरूर जीत लाएगा। लेकिन तीन ओलंपिक खेलों में भाग लेकर भी उसे कामयाबी नहीं मिल पाई। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय तीरंदाजी में वह श्रेष्ठ था और 30 मीटर में उसने विश्व रिकार्ड भी बेहतर किया। एशियन चैंपियनशिप में व्यक्तिगत रजत और टीम स्वर्ण उसके बेहहतरीं प्रदर्शन रहे। उसे भारतीय खेलों का चेहरा और सुपर स्टार माना गया।

लेकिन वक्त बड़ा बेरहम है। खेल जीवन से सन्यास लेने के बाद उसे भारतीय टीम का कोच भी बनाया गया पर यहां भी नाकामी हाथ लगी और इसके बाद की कहानी भारतीय तीरंदाजी के इतिहास पुरुष के लिए दुखद अध्याय बन कर रह गई है। जो लिम्बा कभी देश के खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों के लिए रोल माडल था, जिसे एकलव्य और अर्जुन जैसे संबोधनों से पुकारा जाता था, वह खेल जगत का दीन हीन हस्ताक्षर बन कर रह गया है। आज वह देश भर के हस्पतालों के चक्कर काट रहा है। वह पिछले कुछ सालों से दिमागी डिसआर्डर की ऐसी बीमारी से ग्रसित है, जिसने उसे लगभग अपाहिज बना कर रख दिया है|

जयपुर के सवाई मानसिंह हस्पताल और एम्स दिल्ली में उसका उपचार किया गया लेकिन बीमारी पकड़ में नहीं आ रही। लिम्बा की पत्नी जेनी कहती हैं कि उन पर किसी ऊपरी हवा का वास है, जिसके चलते वह बोलने और चलने की स्थिति में नहीं रहा| कुछ डॉक्टर तो यहां तक कह चुके हैं कि वह शायद ही ठीक हो। जेनी के अनुसार इलाज के लिए उनके पास पैसा नहीं है । चूंकि उसे सरकार से पेंशन नहीं मिलती, इसलिए इलाज का खर्च चलना मुश्किल हो गया है। हालांकि सरकार ने उसे अर्जुन अवार्ड और पद्म श्री दिए पर खाने के लिए रोटी और इलाज के लिए दवा की व्यवस्था कहाँ से करे? एक ओर जहां सरकारें कुछ खिलाड़ियों पर करोड़ों लुटा रही हैं तो बीते जमाने के चैंपियनों की कोई खबर नहीं लेता ।

लिम्बा का कुसूर यह है कि उसने ओलंपिक, एशियाड और ओलंपिक में पदक नहीं जीता। ऐसा हो पाता तो पेंशन के हक़दार जरूर बन जाते। सवाल यह पैदा होता है कि दीपा करमारकर ओलंपिक में चौथा स्थान जीत कर करोड़ पति बन सकती है तो लिम्बा से भेद भाव क्यों? क्योंकि चढ़ते सूर्य को नमस्कार होता है? क्योंकि लिम्बा कम पढ़ा लिखा और गरीब है? एक साक्षात्कार में लिम्बा और जेनी ने हताश होते हुए कहा कि राजस्थान और केंद्र सरकार ने यदि उन्हें इलाज और जीवन यापन के लिए प्र्याप्त सहयोग नहीं दिया तो उनका जीवन दूभर हो जाएगा|

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