बदहाल भारतीय खिलाड़ी: कुछ को करोड़ों और बाकी को नारकीय जीवन!

राजेंद्र सजवान
इसमें दो राय नहीं कि भारतीय खिलाड़ियों को पहले के मुक़ाबले बेहतर सुविधाएँ मिल रही हैं| ख़ासकर, 1982 के दिल्ली एशियाड के बाद से खिलाड़ियों की माली हालत में सुधार हुआ है| उन्हें ना सिर्फ़ राष्ट्रीय कैंपों में पौष्टिक खानपान दिया जा रहा है अपितु विदेश यात्राओं और पदक जीतने पर भी विशेष दर्जा मिल रहा है| जो खिलाड़ी देश के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं और खास कर ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप, कामनवेल्थ खेल और एशियाड में पदक जीत लाते हैं तो उनकी विशेष खातिरदारी की जाती है|

ऐसे खिलाड़ियों की संख्या कुछ एक सौ या हज़ार में हो सकती है| दूसरी तरफ कई लाख खिलाड़ी ऐसे भी हैं जोकि किसी कारणवश अंतरराष्ट्रीय स्तर को नहीं छू पाते या उनका खेल जीवन बाधित हो जाता है| जीवन के कई बहुमूल्य साल खेल को देने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय चैम्पियन जैसे संबोधन उनके साथ नहीं जुड़ पाते| ऐसे लाखों खिलाड़ी गुमनामी और आभावग्रस्त जीवन जीने के लिए विवश हैं| खेल में व्यस्तता के चलते पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते और ना इधर के रहे ना उधर के रह जाते हैं|

अक्सर पढ़ने सुनने को मिलता है कि राष्ट्रीय स्तर का कोई फुटबाल या हॉकी खिलाड़ी रेहडी- पटरी लगाने के लिए विवश है, कई तीरन्दाज़ और एथलीट कूड़ा बीन कर गुज़ारा कर रहे हैं तो अनेक कराटे, तायकवांडो, जूडो, कुश्ती, मुक्केबाज़ी से जुड़े खिलाड़ी अपराधजगत से जुड़ जाते हैं| राष्ट्रीय स्तर के बहुत से खिलाड़ियों को आगे की राह नज़र नहीं आती या चोट और अन्य किसी कारण से पिछड़ जाते हैं| इसका यह मतलब नहीं कि राज्य या देश की सरकारों का उनके प्रति कोई डायत्व नहीं बनता| उन्होने अपने जीवन् के कीमती साल खेल को दिए होते हैं तो फिर अपने राज्य और देश की सेवा के बदले उन्हें भी सुरक्षित जीवन जीने का हक है|

अफ़सोस की बात यह है कि पिछले कुछ सालों मे जहाँ एक ओर पदक विजेताओं को लाखों करोड़ों दिए जा रहे हैं, नौकरी, बेहतर जीवन और सब कुछ उन पर न्योछावर किया जा रहा है तो दूसरी तरफ देश के अस्सी फीसदी खिलाड़ी नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हैं| उनके बारे में सोचने के लिए सरकार और खेल मंत्रालय के पास ना तो समय है और ना कोई योजना| जब किसी डिंको सिंह और लिम्बा राम की द्यनीय हालत की खबर आती है तो नेता, अभिनेता, मीडिया दो-चार दिन घड़ियाली आँसू बहा कर चुप्पी साध लेते हैं|

बहुत से तो ग़रीबी और अभाव का जीवन जी कर मौत को प्यारे हो जाते हैं| उन्हें देने के लिए सरकारों के पास कुछ भी नहीं है| तोफिर कोई क्यों खेले? क्यों इंडिया को खेलने के लिए कहा जा रहा है? भारत यदि सचमुच खेल महाशक्ति बनना चाहता है तो सबसे पहले अपने खिलाड़ियों का सम्मान करना सीखें, उनके लिए जीवन यापन का ज़रिया खोजा जाय| फिर चाहे खिलाड़ी का कद कितना भी बड़ा छोटा क्यों ना हो|

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