क्यों नाराज हैं दिग्गज?

राजेंद्र सजवान
भारत का 2022 विश्व कप खेलने का सपना टूट चुका है और फुटबाल की असल हालत की कलई भी खुल गई है| ‘ब्ल्यू टाइगर्स’ जैसे संबोधनों से जिस टीम को सिर चढ़ाया गया था उसका नशा भी उतर गया होगा| ऐसा मानना है अपने जमाने के जाने माने ओलंपियन, फ़ीफ़ा रेफ़री और ध्यान चन्द अवार्ड से सम्मानित सैयद शाहिद हकीम का, जोकि भारत के सर्वकलीन श्रेष्ठ फुटबाल कोच सैयद अब्दुल रहीम के सुपुत्र हैं|

टोक्यो ओलंपिक 1960 में भारत के लिए खेले 81 वर्षीय हकीम भारतीय फुटबाल की बदहाली से बेहद नाराज़ हैं और पूछने पर भारतीय खेल प्राधिकरण, अखिल भारतीय फुटबाल फ़ेडेरेशन और भारतीय खेल प्राधिकरण को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ते| अंबेडकर स्टेडियम में आयोजित मास्टर्स फुटबाल टूर्नामेंट के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए हकीम सवाल पूछने से पहले ही टीम खेलों को लेकर साई की नीतियों को जमकर कोसा और कहा कि साई सारे फ़साद की जड़ है|

उसके अधिकारी विदेशी कोचों पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान हैं और देश का पैसा फुटबाल की बेहतरी के नाम पर लुटाया जा रहा है| रही सही कसर फ़ेडेरेशन पूरी कर रही है, जिसके पास ना कोई योजना है और ना ही अपनी प्रतिभाओं की बेहतरी के लिए कोई काम कर रही है| आईएसएल को उन्होने गले की हड्डी बताया और कहा कि देश के कुछ औद्योगिक घराने खेलों को लूट रहे हैं और फुटबाल के लिए आईएसएल बड़ी मुसीबत बनने जा रहा है|

मौके पर मौजूद अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रंजीत थापा और जाने माने कोच बीरुमल की तरफ इशारा करते हुए कहा, इनसे पूछिए कि क्या कभी इन जैसे काबिल लोगों की सेवाएँ ली गई हैं! गोरखा ब्रिगेड और मफतलाल जैसी चैंपियन टीमों के धुरंधर खिलाड़ी रहे रंजीत थापा मानते हैं कि मैदान से हटने के बाद उन्हें किसी ने नहीं पूछा, हालाँकि वह अपना ज्ञान और अनुभव भावी पीढ़ी को बाँटना चाहते हैं लेकिन किसी को परवाह नहीं है| बीरुमल जैसे मौका देख रहे थे| अपना गुस्सा उडेलते हुए बोले,’भारतीय खेल प्राधिकरण को टीम खेलों से कोई सरोकार नहीं|

ज़्यादातर खेल इसलिए बर्बाद हो रहे हैं क्योंकि उनके अच्छे कोचों और काबिल अधिकारियों की कोई पूछ नहीं है| यही कारण है कि मुझे बांग्लादेश की जूनियर टीमों को सिखाने का आफर मिला तो मैने तुरंत हां कह दिया|’ बीरुमल 13 साल तक बांग्लादेश के कोच रहे और उनके सिखाए खिलाड़ियों ने भारत को भी हराया था| उनको भारतीय फुटबाल में विदेशी कोचों की घुसपैठ ठीक नहीं लगती|

हकीम की तरह वह भी मानते हैं कि साई और फ़ेडेरेशन ने अपने कोचों को ना सिर्फ़ निरूत्साहित किया है कई एक का करियर खराब भी कर दिया है| हकीम की तरह बीरुमल भी पूछते हैं कि फुटबाल फ़ेडेरेशन उनके जैसे अनुभवी लोगों की सेवाएँ क्यों नहीं लेना चाहती! एनआइएस जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के चीफ़ रहे बीरुमल कहते हैं कि जब तक भारतीय फुटबाल प्रतिभा और अनुभव की कद्र नहीं करेगी, सुधार की कतई गुंजाइश नहीं है| आईएसएल को वह भी बेकार का आयोजन मानते हैं|

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