क्यों है खिलाड़ी होने का अफसोस?

राजेंद्र सजवान
भले ही भारत में खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएँ मिल रही हैं और उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है और यह भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को देश और राज्य की सरकारें लाखों करोड़ों दे रही हैं लेकिन ऐसे भाग्यशाली खिलाड़ियों की संख्या कुछ एक सौ या हज़ार में हो सकती है|

दूसरी तरफ ऐसे लाखों खिलाड़ी हैं जिन्हें ताउम्र खेल कर भी दो जून की रोटी नसीब नहीं हो पाती| इनमें ज़्यादातर खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्होने पूरा जीवन अपने प्रदेश, देश, कालेज या संस्थान को दिया पर बदले में में उन्हे नारकीय जीवन ही मिल पाया| जहाँ एक ओर पदक विजेता ओलम्पियनों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता अर्जित करने वालों को अच्छी नौकरियाँ मिल जाती हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी हैं जोकि चोट, ग़रीबी, अभाव और पारिवारिक परेशानियों के चलते अपना सपना पूरा नहीं कर पाते|

एक सर्वे से पता चला है कि प्रति हज़ार मात्र एक खिलाड़ी ही ऐसे मुकाम तक पहुँच पाता है, जहाँ उसे असुक्षा का आभास नहीं होता और एक लाख खिलाड़ियों में से एक-दो ही लाख़ों-करोड़ों कमा पाते हैं| ख़ासकर, क्रिकेट खिलाड़ियों के पौ बारह हैं| नतीजन देश के हर एक बच्चे और युवा का पहला सपना सचिन, धोनी या कोहली बनने का होता है| जो क्रिकेटर नहीं बन पाते अन्य खेलों में भाग्य आजमाते हैं, उनमें से कुछ एक सुशील, योगेश्वर, सिंधु, सायना, विजेंद्र, बिंद्रा, मैरिकाम, क्षेत्री जैसा नाम और दाम कमा पाते हैं|

सर्वे से यह भी पता चला है कि आबादी के लिहाज़ से भारतीय खिलाड़ियों का सफलता प्रतिशत दुनिया के सबसे पिछड़े देश का है| अफ़सोस की बात यह है कि एक तरफ तो सरकार खेलों का महत्व समझा रही है तो दूसरी तरफ आलम यह है कि अनेकों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अपने खिलाड़ी होने का अफ़सोस मना रहे हैं|

फुटबाल, हॉकी, बास्केटबाल, जूडो, एथलेटिक, तीरन्दाज़ी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी आदि खेलों के हज़ारों खिलाड़ी बेरोज़गार घूम रहे हैं या ग़लत राह चलने के लिए विवश हैं| दो दशक पहले तक खिलाड़ियों को नौकरियाँ मिल जाती थीं लेकिन अब ऐसा नहीं है| तो फिर क्यों खेलें? इसका जवाब तो सरकारों को ही देना होगा!

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