फुटबाल दिल्ली:चाटुकारों की ठोकर पर

राजेंद्र सजवान
पिछले कुछ महीनों में दिल्ली की फुटबाल ने रफ़्तार पकड़ ली है| सब जूनियर, जूनियर, सीनियर और वेटरन खिलाड़ियों के लिए आयोजन किए जा रहे हैं, हालाँकि कोरोमा वायरस के चलते अधिकांश गतिविधियाँ रुक गई हैं| यही मौका है जब दिल्ली की फुटबाल और उसके कर्णधार बेहतरी के लिए सोच सकते हैं और अगली बार जब भी मैदान में उतरें तो उनके सामने बेहतर लक्ष्य और योजनाएँ होनी चाहिए|

इसमें दो राय नहीं कि शाजी प्रभाकरण के डीएसए अध्यक्ष बनने के बाद से स्थानीय गतिविधियों में विविधताऔर निरंतरता आई है| जो फुटबाल सुभाष चोपड़ा की अध्यक्षता में रसातल में धसक रही थी उसको शायद तिनके का सहारा मिल गया है| लीग मुक़ाबले आयोजित हो रहे हैं, महिला लीग,छोटी उम्र के बच्चों के आयोजन और अन्य कई आयोजनों से खिलाड़ियों को अवसर मिल रहे हैं| दिल्ली का संतोष ट्राफ़ी के मुख्य ड्रॉ में स्थान बनाना सराहनीय उपलब्धि कहा जा सकता है|

चैम्पियन क्लब गढ़वाल हीरोज का आई लीग में प्रदर्शन दिल्ली की फुटबाल की पहचान को और पुख़्ता कर रहा है फिरभी चिंता का विषय यह है कि ज़्यादातर बड़े नाम और पहचान वाले कई क्लब दम तोड़ने की कगार पर खड़े हैं| कुछ एक का अस्तित्व खतरे में है| यदि स्थापित क्लब दम तोड़ते हैं तो राज्य की फुटबाल के लिए अपशगुन होगा| इस बारे में क्लब प्रबंधक और डीएसए को मिल कर विचार अवश्य करना चाहिए|

लेकिन अधिकांश फुटबाल प्रेमी, क्लब संचालक और डीएसए पदाधिकारियों की माने तो ऐसे क्लब डूब रहे हैं जिनके अधिकारियों ने खेल को गंभीरता से लेना छोड़ कर जी हुजूरी को पेशा बना रखा है| चुनावों में सत्तासीन अधिकारियों की खिलाफत करना या स्वार्थ साधने के लिए उनके तलवे चाटना ही उनका काम रह गया है | बेशक, शाजी प्रभाकरण भी ऐसे चाटुकरों से घिर गये हैं|

यह बात अलग है कि शाजी चाटुकारों से काम निकालना जानते हैं और विरोधियों को पटखनी देने की कलाकारी भी सीख गये हैं|भले ही अध्यक्ष महोदय अपने संबंधों और पहुँच का उपयोग दिल्ली की फुटबाल की बेहतरी के लिए करते प्रतीत हो रहे हैं किंतु एक ऐसा धड़ा है, जिसे सिर्फ़ आलोचना करना और खेल बिगाड़ना ही आता है| उसे फुटबाल से कोई लेना देना नहीं, बस भड़ास निकालने से मतलब है| ऐसे ही लोगों के कारण दिल्ली फुटबाल में कभी बड़ी ताक़त नहीं बन पाई|

संतोष ट्राफ़ी जीते और राष्ट्रीय चैम्पियन बने सालों बीत गए हैं| तमाम आयु वर्ग की टीमें शुरुआती दौर में पिट रही हैं| कारण, टीमों के चयन में धाँधली, कोटा सिस्टम और चाटुकरों की चयनसमिति में घुसपैठ है|चयनकर्ता आज भी वही हैं, जोकि पिछले कई सालों तक पूर्व अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा के लाड़ले बने रहे और अब शाजी को राज़ी करने के लिए घटियापन की तमाम सीमाएँ लांध रहे हैं| यही सब राष्ट्रीय स्तर पर चल रहा है| नतीजन फ़ेडेरेशन का नकारापन देश, दिल्ली और तमाम प्रदेशों की फुटबाल को बर्बाद कर रहा है|

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