बदहाल फुटबाल

राजेंद्र सजवान
भारतीय फुटबाल क्यों प्रगति नहीं कर पा रही और क्यों भारत दुनिया केT पहले 60-70 देशों में स्थान नहीं बना पा रहा, यह सवाल जब कभी फुटबाल जानकारों औ पूर्व खिलाड़ियों से पूछा जाता है तो हर कोई तपाक से बोल देता है, “फ़ेडेरेशन(एआईएफएफ) से पूछें”| यह जवाब कहीं ना कहीं देश में खेल की संचालक संस्था के प्रति नाराज़गी व्यक्त करता है| ऐसा स्वाभाविक भी है|

किसी भी संस्था या संगठन के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी सफलता विफलता के लिए सीधे ज़िम्मेदार होने भी चाहिए| लेकिन भारतीय फुटबाल के कर्णधरों ने कभी भी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं कराया| कुछ साल पहले जब प्रिय रंजन दास मुंशी अध्यक्ष थे तो उन्होने मनमर्ज़ी से फुटबाल को नचाया और अब प्रफुल्ल पटेल और उनके सचिव कुशल दास खेल से खिलवाड़ कर रहे हैं| पूर्व खिलाड़ियों की माने तो भारत दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल में इतना पीछे छूट गया है कि विश्व कप खेलने का सपना शायद ही कभी पूरा हो पाए|

ऐसा खेल से प्यार करने वालों का दिल तोड़ने के लिए नहीं कहा जा रहा बल्कि सच यही है कि भारत इस खेल में महज खानापूरी करता नज़र आ रहा है| देश के जाने माने कोच, पूर्व खिलाड़ी, खेल जानकार और अधिकारी पतन के लिए सीधे सीधे फ़ेडेरेशन को ज़िम्मेदार मानते हैं, जिसने अपने कोचों पर कभी भरोसा नहीं किया| उनके अनुसार विदेशी कोच बार आए-गए, झूठे दावे करते रहे और मोटी कमाई कर चलते बने|

विदेशियों ने साई और फ़ेडेरेशन से मिली भगत कर देश को बेवकूफ़ तो बनाया ही खेल को भी कहीं का नहीं छोड़ा| ज़्यादातर जानकारों का आत्मविश्वास इतना गिर गया है कि उन्हें फ़ेडेरेशन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रहा| ओलंपिक और वर्ल्ड कप क्वालीफायर में राष्ट्रीय टीम का शर्मनाक प्रदर्शन भारतीय फुटबाल को डराने वाला रहा है| जो देश कभी ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहा और दो बार एशिया का चैम्पियन बना उसकी हालत पर भला किस देशवासी को तरस नहीं आएगा! आईएसएल और आईलीग को छलावा मानने वालों का कहना है कि यह आयोजन सिर्फ़ इसलिए किए जा रहे हैं क्योंकि कुछ बड़े औद्योगिक घरानों को खुश करना है|

देखा जाए तो पिछले पचास सालों में भारत ने फुटबाल में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया| गिरावट की हदें पार कर चुका यह खेल देशवासियों की कसौटी और उम्मीद पर बिल्कुल भी खरा नहीं उतर पाया और आगे भी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती| जब 140 करोड़ की आबादी वाले देश के पास ग्यारह भरोसे के खिलाड़ी नहीं हैं तो कैसे मान लें कि भारतीय फुटबाल ज़िंदा है!

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