यह उपदेश नहीं सिर्फ़ प्रार्थना है| यदि आप सहमत हों तो प्रतिक्रिया ज़रूर दें और अन्य तक भी पहुँचाएँ|

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
मुख्य मंत्री उत्तराखंड
सादर नमस्कार!

कोरोना वायरस के चलते घोषित लॉकडाउन के कुछ घंटे बाद और अगले चार पाँच दिनों तक दिल्ली मुंबई, बंगलोर, कोलकात्ता और तमाम बड़े-छोटे महानगरों और शहरों में भगदड़ का जैसा माहौल देखने को मिला, वह भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी है| ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आज़ादी के बाद सरकारों ने कभी सोचा नहीं कि ऐसा दिन भी देखना पड़ सकता है| भले ही कोरोना एक बड़ी आपदा है, लेकिन तमाम इंतज़ामों के बावजूद हम इसलिए विफल हुए क्योंकि हमने देश की बढ़ती आबादी और शहरों पर बढ़ते बोझ के बारे में कभी सोचा ही नहीं और शायद सब कुछ ठीक हो जाने के बाद भी नहीं सोचेंगे और किसी और बड़ी आपदा को न्योता दे सकते हैं|

आपने और हम सभी ने देखा कि किस प्रकार देश के करोड़ों नागरिक, दिहाड़ी मजदूर, सरकारी, ग़ैरसरकारी कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे थे| आनंद विहार बस अड्डे पर जमी भीड़ और तमाम प्रदेशों से अपने गृह प्रदेश की तरफ बढ़ा जन सैलाब किस प्रकार अनियंत्रित हो गया था, हम सब ने देखा और उसकी सज़ा भी भुगत रहे हैं| यह साबित हो गया है कि हर नागरिक अपने गाँव और गृह नगर में ही अपने परिवार के साथ सबसे ज़्यादा सुरक्षित महसूस करता है|

सरकारों ने भी महसूस कर लिया है और उन्हें यह भी पता चल गया है कि आने वाले सालों में समस्या और विकट होने जा रही है| हमारे शहर करोड़ों की आबादी को बर्दाश्त करने वाली स्थिति में नहीं हैं और दुनियाभर में आया आर्थिक संकट भी सबसे ज़्यादा भारत पर भारी पड़ने वाला है| हमारे बच्चों और भावी पीढ़ी के लिए विदेशों में शिक्षा और रोज़गार पाना मुश्किल होगा, क्योंकि ज़्यादातर उन्नत देश कोरोमा के कारण बर्बाद हो चुके हैं और उन्हें उबरने में वक्त लग सकता है| स्वाभाविक है कि हमें अपने साधनों पर निर्भर रहना होगा और शायद ग्रामीण भारत की तरफ लौटना पड़ सकता है| गाँवों की सुध लेने का वक्त आ गया:

कोरोमा के कारण देश की अधिकांश ग्रामीण आबादी अपने अपने गाँव पहुँच गई है, जोकि हालत ठीक होने के बाद फिर से वापस लौटेगी क्योंकि भारतीय गाँवों में रोज़ी रोज़गार की कोई व्यवस्था नहीं है| यही समय है कि सरकार जाग जाए और गाँवों में छोटे-बड़े उद्योग शुरू करे| ऐसा करने से शहरों पर बोझ कम होगा, जो गाँव पहुँच गये हैं उन्हें वहीं रोकने का उपाय हितकर रहेगा|


बेहतर होगा बिना वक्त गँवाए सरकारें ऐसा कदम उठाएँ जिससे गाँव और शहर का संतुलन बना रहे| उत्तराखंड क्यों बदलाव चाह रहा है: अक्सर पढ़ने सुनने को मिलता है कि उत्तराखंड के तमाम गाँव खाली हो चुके है| आबादी के नाम पर ज़्यादातर गाँवों में कुछ एक वृद्ध और बेहद निचले तबके के लोग बचे हैं या नेपाल-बिहार, यूपी के मजदूरों ने डेरा जमा लिया है| दरअसल, उत्तराखंड के गाँव इसलिए खाली हुए क्योंकि हमारे बाप-दादा मेहनत करते करते मर खप गये|

मीलों पैदल चल कर स्कूल जाना, बारिश पर निर्भर खेती और तमाम मुश्किलों ने आम उत्तराखंडी की कमर तोड़ डाली और अंततः धीरे धीरे पूरा प्रदेश शहरों की तरफ भाग खड़ा हुआ| दोष पूरी तरह सरकारों का रहा है| नेता-सांसद भोले भाले पहाड़ियों की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे| उनके पाप की सज़ा पूरी तरह बंजर हो चुका प्रदेश और पूरा देश भुगत रहा है|

नेताओं, देश के भाग्यविधताओं, अब भी जाग जाओ| प्रदेश को कल कारखाने, फैक्ट्रियाँ और छोटे बड़े उद्योग चाहिए, गाँवों को सड़कों से जोड़ो, अच्छे स्कूल और हस्पताल बनाएँ| फिर देखना लाखों करोड़ों गाँव की तरफ लौटने लगेंगे| बेशक, कुदरत ने दुनिया की सरकारों को चेतावनी दी है, मौका दिया है| अब नहीं सुधरे तो शायद महाविनाश तय है|

राजेंद्र सजवान

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