उतराखंड में लौटे प्रवासियों से क्यों उकता गए हैं अपने?

राजेंद्र सजवान

foto; RS Bisht
लॉकडाउन की शुरुआत के दो दिन बाद उत्तराखंड का एक वीडियो ख़ासा वायरल हुआ था जिसमें एक महिला दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और अन्य प्रदेशों और विदेशों से अपने गाँव लौटने वाले गढ़वाली- कुमाउनी युवक युवतियों को चप्पल दिखाते हुए और पहाड़ों में उगने वाली विषैली पौध कॅंडाली दिखाती हुई कह रही थी,’खबरदार गाँव आने की ज़रूरत नहीं है| मुसीबत आई तो गाँव की तरफ भाग रहे हो| अपनी बीवी के सिखाने पर अच्छे ख़ासे गाँव को छोड़ शहरों के नरक में क्यों बस गए थे’?
हालाँकि तत्पश्चात कई वीडियो आए जिनमें अपने भाई, बंधुओं को गाँव लौटने के लिए प्रोत्साहित किया गया और उन्हें वापस लौट  कर गाँव की तरक्की में योगदान देने का आह्वान किया गया है| लेकिन जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं, कोरोना विकराल रूप धारण कर रहा है प्रवासियों को ताने सुनने पड़ रहे हैं| यह बात अलग है कि बिहार, झारखंड, छातीसगढ़, यूपी और राजस्थान के मजदूरों की हालत बेहद दयनीय है| लाखों- करोड़ों की भीड़ बदहवास होकर दौड़ी चली जा रही है| भूख, रेल, सड़क और बीमारी से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है| हर कोई अपने गाँव पहुँचना चाहता है| यह जानने का प्रयास भी नहीं कर रहा कि गाँव जाकर क्या करेगा और वहाँ रोज़ी रोटी का जुगाड़ कैसे हो पाएगा| बस हर कोई कह रहा है कि एक बार किसी तरह से गाँव पहुँच जाएँ, अपनों के दर्शन कर लें फिर चाहे मर ही क्यों ना जाएँ|
जाहिर है देश का श्रमिक पीड़ा में है| कोरोना और लॉकडाउन ने उसे बुरी तरह तोड़ दिया है और सैकड़ों हज़ारों किलोमीटर पैदल चल कर अपने जन्मस्थान पहुँचना चाहता है| हालाँकि टिहरी, पौडी, चमोली, उतरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और अन्य जिलों के पहाड़ियों को फिलहाल इस कदर दिल दहलादेने वाली परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ रहा लेकिन हालत पहाड़ में भी चिंतनीय हैं| गाँव में रहने वाले विपदा में पड़े अपने परिजनों के लौटने पर खुश तो हैं लेकिन यह खुशी दिखावेभर की ज़्यादा है| गाँव में अब तक अपने भाई बंधुओं की खेती खाने वालों को यह चिंता सताने लगी है कि अब उन्हें उपहार में मिले खेत, पेड़ पौधों और घास लकड़ी से हाथ धोने पड़ सकते हैं| जहाँ एक तरफ बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड आदि प्रदेशों में प्रवासियों को लेकर मार काट शुरू हो चुकी है और गोलियाँ चल रही हैं तो उतराखण्ड में भी टकराव की राजनीति चल निकली है| गाँव में चौधराहट रखने वालों को प्रवासी खलने लगे हैं| यहाँ तक कहा जाने लगा है कि शहरों के गुंडे गाँव का माहौल खराब करने आ गये हैं| अर्थात जिन अपनों को गाँव वाले बाहर का मान चुके थे, उनकी वापसी बड़े विवाद का कारण बन गई है| देश विदेश से लौटे उतराखंडी खुद को अपने बाप दादाओं की ज़मीन पर असहज पा रहे हैं| पहाड़ से प्राप्त रिपोर्ट पर गौर करें तो गाँव के लोगों को डर सता रहा है कि अब उन्हें हर चीज़ में हिस्सेदारी करनी होगी| मज़दूरी भी पहले जैसी नहीं मिल पाएगी| सबसे बड़ी परेशानी यह है कि प्रवासी उन्हें चालू प्रवृति के नज़र आते हैं जोकि घाट घाट का पानी पी चुके हैं और अब भोले भाले लोगों का जीना हराम कर सकते हैं|

 

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